Monday, November 16, 2009

Baazaar (बाज़ार)

देवियों और सज्जनों,
आइए आइए यहाँ पर बाज़ार लगा है,
जहाँ सब कुछ बिकता है।
चमकीले लिबासों में सजा,
यहाँ सब कुछ मिलता है।

यहाँ हर चीज़ की कीमत है,
बस चुकाने वाला चाहिए।
दिल को बड़ा कर बोली लगाइए,
फिर कीमत चुकाइए,
और घर ले जाइए।

यहाँ इंसान बिकते हैं,
और उनके अरमान भी,
ज़मीर खरीदे बेचे जाते हैं।
कीमत मिलने का वायदा मिले,
तो जज़्बात भी बिक जाते हैं।

ये बाज़ार बड़ा ज़ालिम है बाबू,
जो दिखता है बस वही बिकता है।
यहाँ जंगल का कानून है लागू,
जो गिरा पड़ा है,
वो रौंद दिया जाता है।

इसकी हवा में एक नशा है,
जो यहाँ आता है,
वो धुत हो जाता है।
संयम और समझदारी से ही,
इस से बचा जा सकता है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१६-११-२००९ 16-11-2009

Saturday, November 14, 2009

Pagli Ladki (पगली लड़की)

This poem is one of the earliest and best written by our own renowned Hindi poet Dr. Kumar Vishwas. Enjoy...

अमावस की काली रातों में, दिल का दरवाज़ा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में, गम आँसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में, हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक टिक चलती हैं, सब सोते हैं हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से, सारी यादें चुभ जाती हैं,
जब ऊँच नीच समझाने में, माथे की नस दुख जाती है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।

जब पोथे खाली होते हैं, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नहीं आतीं, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे, दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लश्कर छत से, गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा, मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली, पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ, गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मना करने पर भी, पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना मनचाहा हर काम, कोई लाचारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।

जब कमरे में सन्नाटे की, आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आँखों के नीचे, झांई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो लल्ला दिन भर, कुछ सपनों का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में, कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने लड़की का, एक फ़ोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फ़ोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना, हम को फ़नकारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।

दीदी कहती हैं कि, उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैय्या, तेरे जैसे प्यारे जस्बात नहीं,
वो पगली लड़की मेरे खातिर, नौ दिन भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, पर मुझ से कभी न कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्हीं से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना, कुछ भी अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग, जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।


- डा० कुमार विश्वास

Wednesday, November 11, 2009

Jana Gana Rann (जन गण रण)

This song 'Jana Gana Rann' is from an upcoming Ram Gopal Varma's movie 'Rann'. The lyrics is striking and I was shaken when I first heard it. It shares a distinct similarity with our National Anthem which makes it so appealing. I will not be surprised if there are objections raised over this song and the movie in future. Have a look and please do listen to the song before they ban it.

जन गण मन रण है इस रण में,
ज़ख्मी भारत का भाग्यविधाता।

पंजाब सिंधु गुजरात मराठा,
इक दूसरे से लड़ के मर रहे हैं।

इस देश ने हम को एक किया और हम देश के टुकड़े कर रहे,
द्राविड़ उत्कल बंगा।

खून बहा कर एक रंग का कर दिया हमने तिरंगा,
सरहदों पे जंग और गलियों में फसाद रंगा।

विंध हिमाचल यमुना गंगा,
में तेज़ाब उबल रहा है|

मर गया सबका ज़मीर,
जाने कब ज़िंदा हो आगे।

फिर भी तब शबनम में जागे,
तव शुभ आशीष माँगे।

आग में जल कर चीख रहा है फिर भी कोई नहीं बचाता,
गाहे तव जय गाथा।

देश का ऐसा हाल है लेकिन,
आपस में लड़ रहे नेता।

जन गण मंगलदायक जय हे,
भारत को बचा ले विधाता।

जय हे या ये मरण है,
जन गण मन रण है।

Monday, November 9, 2009

Aaj Vo Dukhi Hai (आज वो दुखी है)

आज वो दुखी है,
उसका दिल टूटा है,
उसका कोई अपना,
आज उस से रूठा है।

आज रिश्तों के कुछ,
मज़बूत बंधन टूटे हैं,
पुराने कुछ धागे उसके,
हाथों से छूटे हैं।

क्या करे वो कहाँ जाए,
किसको अपनी पीड़ा बतलाए,
घर उसके खुशी की दस्तक हुए,
आज एक अरसा बीता है।

नादान था वो,
अभी तक बच्चा था,
सही गलत पहचानने में,
अभी थोड़ा कच्चा था।

वो जिसे अपना समझ,
ताउम्र झुलसता रहा,
वही दगाबाज उसे,
हमेशा ही डसता रहा।

पर अब इंसानी फितरत को,
उसने बखूबी भाँप लिया है,
और संभलने का प्रण कर,
वो दोबारा चल पड़ा है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०९-११-२००९ 09-11-2009

Sunday, October 25, 2009

An Unforgettable Night

After that night, I told to myself that I’ll never share that experience with my readers on my blog. Actually it was a very depressing period of my life and I was at my weakest. I seriously thought that night that I’ll not be able to see the next morning sun. Nevertheless, after around one year, I finally decided to break those mental shackles and write about the darkest night of my life. And which better place to write about the experience than the place from where it all began, the train from Bareilly to Ghaziabad by which I returned to college today after Diwali vacations.

I should start from the morning of 5th January, 2009, or otherwise the whole situation will not be clear. It was a chilly winter morning and I boarded the train from Bareilly to Ghaziabad, to resume college for the 6th semester. Mom insisted on wearing a jacket over the thin sweater I was wearing but I had a tendency to act like ‘Phantom’ in winters, so I refused. And then the journey started, which changed my life for ever.

I was allotted a window seat and despite all my efforts to keep that damn thing closed, it repeatedly unlocked itself and let the chilly breeze in. And as predicted by mom, soon I was shivering like hell. After three hours of journey, I felt some relief when the sun was finally out from. But it was still cold.

Around noon, I reached the college campus and was glad to be back. I took a nap as I was tired after the journey. It was not until in the evening around 6pm, I felt something is wrong within. I had started to shiver and was feeling weak. In addition, I felt some fever too. So, after dinner, I took a Paracetamol and hoped that I’ll be fine.

But by the time the clock struck 9, I knew that it is not just an ordinary fever. I was shivering uncontrollably. My limbs were numb, my forehead was burning, was having fits of cough with sputum, was unable to breathe, and there was no way I could fell asleep.

After three hours of suffering, I decided to repeat the medication as it was obvious that the previous dose had no effect. I took a Vicks Action 500 in order to get some relief from cold apart from fever. But nothing seemed to have been working that night. After an hour or so, I was now spitting blood! At this moment, I wished that God should take my life away so that my suffering could end.

It was 4am and I hadn’t slept a bit. My condition was worse than ever, and the constant shivering was making my life miserable. I am not a religious person, but at that time, I was thinking that if there is God somewhere, He is taking into account for all the sins I have committed in my entire life. All my memories were flashing in front of me, as I waited for the morning sun. Meanwhile, I took another tablet, although I knew I should not because there should be enough gaps between doses.

At 7:30am I some how moved to the mess, so that I could have something for breakfast, because all the medicines I took were not required to take on empty stomach. With utter difficulty, I had a bowl of dalia. And now I had to wait for the campus doctor to come to his clinic.

After 10am, when the doctor arrived, I told him my symptoms, and not to my surprise, he was baffled and immediately referred me to Fortis hospital with number of blood, urine and sputum tests. Later in the afternoon, finally, I was diagnosed of Acute Bronchitis and was put on heavy medication for 7 days.

These two days and the night between them were pretty hard on me. The more I try to forget them, the more they haunt me. The only positive came out of all this fiasco was that I started valuing and respecting life which God has given me. Today, I strongly believe that there was some invisible force, some power, which despite of all my miseries, helped me to pass out that period of agony and suffering and gave me a sort of rebirth in this beautiful world. May God don’t let this happen to anyone what happened to me that night.

Tuesday, October 13, 2009

Madhushala (मधुशाला)

Madhushala is an epic work of late Shri. Harivansh Rai Bachchan. Consisiting of 135 rubaai (verses of four lines) and 4 were added later, the poet tries to explain the complexity of life in a highly metaphorical way. When first published, it met criticism from many people for its apparent praise of alcohol, but later when the hidden meaning of the verses were understood, it was an instant hit. Below are the few rubaaiaa which are my favorites. Enjoy...


धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।

और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

- हरिवंश राय बच्चन

Saturday, October 10, 2009

How To Live A Happy And Satisfied Life

I found it interesting so I'm posting it here on my blog.


In each day that passes by, we stand by and witness how our lives are being lived without the full happiness and satisfaction we crave and need. Most people spend their time stressed out, worried and on a constant panic about what needs to be done for their futures, raising their children, wired up over work, school, along with everything else. Does this sound familiar? Well if it does, it is because so many people live with this style and pattern. When you can start living that fully happy and satisfied life?

The only way you can live a happy and satisfied life, is when you start doing things that make you happy and satisfied. Sure, it sounds easy, and can be easy if you just remember to make yourself one of your top priorities. Too many people neglect themselves, feeling that it would be selfish if they took any time out to focus on their own being. While it is good to take care of others and other important things going on in your life, it is mandatory that you never forget about yourself. Discover who you really are and what matters most to you. Living a great life does not just happen. It requires, planning and following those plans to a life that reflects who you truly are.

Most people avoid planning goals and dreams in their lives because they may have a fear of committing to it or failing. They feel that by officially writing it down, they would actually have to go through with pursuing it. This is where you need to rate the importance of your life missions. What is most important to you? Is it losing a certain amount of weight? Getting your degree? Spending more time with your spouse or children? Whatever the reason or reasons may be, just write all of them down. You may feel that making a mental note of your goals and dreams is enough, but you could very well be setting yourself up for disappointment and failure. By writing it down, you will become a visual witness of those goals. Try writing them in an organizer, with a little reminder written in each day.

Setting deadlines for these goals would be a great way to assure they will be accomplished. Avoid disappointment by setting realistic deadlines. For example, if you wanted to lose 10 pounds, do not give yourself a week to do so. You will only torture yourself and become depressed when the week is over and see that you did not come even close to losing the 10 pounds. In fact, you may give up losing weight altogether because of the failure you experienced, simply because your deadline was unrealistic. Take some time everyday to look over your goals and remind yourself of how important they really are to you. Ask yourself why they are important to you too. Knowing that something is important is not enough. You must know the reasons behind the importance of the dreams and goals you have, so that your mind can see it more clearly and understand exactly why it is so necessary to go through with your missions.

Excuses are demons you must learn to fight off if you wish to start living a happy and satisfied life. Most people claim to have many dreams, but say they just do not have the time to approach them. Stop making excuses! You are the only one who holds the power to make a real difference in your life. Sure, we all have busy lives with our careers and families, but nothing takes up 24 hours of your day. So if something is truly important to you, you will be sure to make the time to work on it. You can do this by replacing it with something less important. For example, if you claim you do not have the time to work on the other important goals in your life, perhaps it is time for you to start making close observations on the way you spend your time. If you spend several hours of the day working, studying, and then several hours taking care of house chores and family, what else are you doing with the rest of your day? If you spend a good portion watching television, then you need to cut back on that and use that time to begin and follow an exercise plan you have been thinking to focus on for a long time (or whatever goal it is you have).

Making yourself one of your first priorities is not selfish. It actually is obligatory to do so in order to succeed in the other subjects of your life. Without a happy and satisfied you, there will be no happy and satisfied life, because you will be stressed out and unhappy. You might be consciously ignoring your needs and desires, but your subconscious mind has not forgotten about you and will constantly remind you through stress, anger, sadness, insecurity and feelings of failure.

Saturday, October 3, 2009

Mrityu Ki Godd Mein (मृत्यु की गोद में)

एक दिन ऐसा आएगा,
जब ये सब कुछ नहीं रहेगा,
रह जाएगा तो बस एक पिंजर,
और उसमें कैद एक रूह।

रूह भी इस ताक में कि,
कब मौका मिले तो फुर्र हो,
और पिंजर का क्या है,
उसे तो ख़ाक में ही मिलना है।

मुद्दा ये नहीं कि क्या किया,
मुद्दा ये कि क्या करना रह गया,
ईश्वर द्वारा दिए गए सीमित समय में,
कौन काज संवरना रह गया।

हे बंधुजन, ये सुनो!

मृत्यु की गोद में समाने से पहले,
अपने मकसद को पहचानो,
और उस दिशा में आगे बढ़ो,
क्या पता कल हो न हो।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०३-१०-०९ 03-10-2009

Thursday, October 1, 2009

Safar (सफ़र)

My friend's parents are celebrating their 25th marriage anniversary this week and he asked me to write a poem for that occasion. So here it is, my first "On Demand" poem.


वक्त अपनी रफ़्तार से चलता रहा और हम मंज़िल की तलाश में भटकते रहे,
इस बीच एक हमसफ़र मिला तो सोचा साथ चलेंगे तो राहें आसान होंगी।

पता ही न चला कि कब मंज़िल से ज़्यादा राहें प्यारी हो चलीं,
क्योंकि इस बहाने हमसफ़र के साथ चलने का बहाना मिल गया।

ज़िंदगी है ही ना खत्म होने वाला सफ़र,
जिसमें गर कोई साथी मिले तो मज़ा ही कुछ और है।

आज मुड़ कर देखते हैं तो सफ़र के निशां दिखते हैं,
हमारे साथ के गवाह हमारे अपने साथ दिखते हैं।

सैंकड़ों खट्टी मीठी यादों के सहारे हम,
२५ सालों के इस ठहराव पर आ पहुँचे हैं।

अब बस यही दुआ है खुदा से कि इस ठहराव को मंज़िल का नाम न मिले,
और जब तक चल रही हैं साँसें या खुदा ये सफ़र भी यूँ ही चलता रहे।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०१-१०-०९ 01-10-2009

Monday, September 28, 2009

Ravan (रावण)

Today is Dussehra (Vijay Dashmi). So, I thought to celebrate it by writing a poem.

कहते हैं कि आज के दिन,
श्री राम ने रावण का वध किया था।
घोर बुराई का अंत कर,
संसार को पाप मुक्त किया था।
दस सिरों वाले राक्षस की,
नाभि भेद उसका संहार किया था।

तब से लेकर अब तक हर वर्ष,
हम ये प्रथा निभाते हैं।
कागज़ का रावण बना कर,
उसे हम फिर जलाते हैं।
और इसे बुराई पर अच्छाई की जीत
समझ कर हम खुश हो जाते हैं।

पर कब हम अपने भीतर पलते,
सहस्त्र सिरों वाले रावण को मारेंगे।
नाभि भेद उस राक्षस की अपने,
अंतर्मन को पावन करेंगे।
जिस क्षण ऐसा कुछ हम करेंगे,
उस क्षण दशहरे को हम चरितार्थ करेंगे।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२८-०९-०९ 28-09-2009

Friday, September 25, 2009

Ardhangini (अर्धांगिनी)

This poem is dedicated to my mother, Dr. Shashi Gupta.

वो जो हर पुरुष की पूरक है,
करती उसके लिए व्रत है।

वो जो ममता का सागर है,
वही जो प्रेम की गागर है।

वो जो गरिमा की मिसाल है,
वही जो ज्ञान का भंडार है।

वो जो कहती कुछ नहीं,
वही जो सहती सब कुछ है।

वो जिसे खुद कुछ चाह नहीं,
पर उसे सबकी चाहत का ख्याल है।

वही तो परिवार चलाती है,
हर मुसीबत से भिड़ जाती है।

वो जब दबी-कुचली जाती है,
तब वही रण-चंडी बन आती है।

वो जो करोड़ो में एक है,
वही जो सबसे नेक है।

उसकी उपस्थिति मंगलमय है,
वही जो सर्वप्रिय है।

वो जो समाज का आधार है,
वह और कोई नहीं अर्धांगिनी है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२५-०९-०९ 25-09-2009

Sunday, September 6, 2009

Maine Use Kavi Bante Hue Dekha Hai (मैंने उसे कवि बनते हुए देखा है)

I feel delighted to present to you all, the poem which is written by my dear friend Aishwarya Gupta. He wrote this poem keeping in mind my life incidences and described them in a very beautiful way. He gave this poem to me as a present for completing 100 posts on my blog. I could not resist to post this poem here. Thank You very much Aishwarya for such a wonderful present.


एक समय था जब वो भी सबकी तरह,
वक्त की ओखली में पिसा करता था।
बहुत डरा करता था आने वाले समय से,
अपने मन के खिलाफ़ सारे काम किए जा रहा था।

भ्रमित हो रखा था वो अपने जीवन के लक्ष्य से,
नहीं मिल रही थी वो राह जिस पर हमेशा के लिए चलता रहे।
मतलब की चादर ओढ़े दुश्मन रूपी दोस्त दुश्मन बनते चले गए,
अपने विचारों के साथ वो अकेला रह गया।

धीरे-धीरे उसी अकेलेपन में मिल गई उसे वो राह,
वो चाह जिसे ढूँढने वो अकेला हो चला था।
एक सुबह बनी उमंगों की ऐसी ’इमारत’,
टूट गया उसकी कलम का व्रत।

आज चेहरे पर दिखती है संतुष्टि,
मुस्कान में एक गौरव, आने वाले जीवन से बेफिक्र,
वो लिखता चला जा रहा है,
उसकी कलम का असर किसी और पर ना सही उस पर दिखता जा रहा है।

मैंने कीचड़ में उगते हुए कमल को नहीं देखा पर,
मैंने उसे कवि बनते हुए देखा है।


ऐश्वर्य गुप्ता
०६-०९-०९
जेपी विश्वविद्यालय

The Centenary Post



Ahh!! Finally, it is the 100th! Awesome feeling! I can't believe it myself. I am not known to hang in there to anything for so long. And when I started writing, I never knew there would be a day in my life, when I'll write the centenary post of my blog. But somehow, here I am, after more than 13 months from the day I first wrote on the blog, still pretty active in the bloggers' world.

Frankly speaking, I started blogging to get rid of the LAN gaming addiction. Counter Strike was killing me. All I thought was about the CS maps, guns, strategies etc. and was drifting away from the real world. Then one day, I gave it a long thought and decided that it was enough. I quit CS. But then what to do next? How to kill spare time? Reading and writing was my childhood hobby but it got neglected after school days. Then came a wild idea! Why not create a blog and start writing in such a way, that the whole world can read it? And that’s how my blog was born.

The feeling you get when you see your name flashing in the Google results with some meaningful information attached to it is awesome. I realized this when I first saw it for myself. Another great feeling is when some stranger, after arriving at your blog and reading it, leaves a word of appreciation as a comment. It seems that a bond has been created between me and that stranger through that comment. And now, I have one more person in the world, who cares for what I write. I feel as if now I have transformed from 'a nobody' to 'a somebody'.

I know its been a long and boring post with relatively no useful information what so ever, but I cannot wind it up without giving a vote of thanks to a few people, who read whatever I wrote, and occasionally advised me how to improve myself. Their each criticism brought a new zeal in me, to deliver better than the previous effort. Their every appreciation worked as an inspiration for me. Thank You Vaibhav Jain Sir, Aishwarya Gupta, Sudhir Kumar, Divyanshu Tripathi, Pallavi Singh, Taniya Garg, Anand Advani, Utkarsh Mishra, Piyush Yadav & Mudit Singh. I hope my tryst with pen lasts for some more wonderful moments and you are all there to share them with me. Thank You!!

How A Software Project Starts


After studying the specifications and requirements of the project the Programmer tells the Team Leader.
Programmer to Team Leader: "We can't do this proposed project. It will involve a major design change and no one in our team knows the design of this legacy system. And above that, nobody in our company knows the language in which this application has been written. So even if somebody wants to work on it, they can't. If you ask my personal opinion, the company should never take this type of project."
**********

The Team Leader is then summoned by the Project Manager.
Team Leader to Project Manager: "This project will involve a design change. Currently, we don't have any staff who has experience in this type of work. Also, the language is unfamiliar to us, so we will have to arrange for some training if we take this project. In my personal opinion, we are not ready to take on a project of this nature."
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The Project Manager then moves the word to the Director.
Project Manager to Director: "This project involves a design change in the system and we don't have much experience in that area. Also, not many people in our company are appropriately trained for it. In my personal opinion, we might be able to do the project but we would need more time than usual to complete it."
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The Director then calls the Vice President.
Director to Vice President: "This project involves design re-engineering. We have some people who have worked in this area and others who know the implementation language. So they can train other people. In my personal opinion we should take this project, but with caution."
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The Vice President then explains the situation to the CEO.
Vice President to CEO: "This project will demonstrate to the industry our capabilities in remodeling the design of a complete legacy system. We have all the necessary skills and people to execute this project successfully. Some people have already given in-house training in this area to other staff members. In my personal opinion, we should not let this project slip by us under any circumstances."
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The CEO's assurance to the Client.
CEO to Client: "This is the type of project in which our company specializes. We have executed many projects of the same nature for many large clients. Trust me when I say that we are the most competent firm in the industry for doing this kind of work. It is my personal opinion that we can execute this project successfully and well within the given time frame."
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And that is how a Software Project starts. Hell Yeah!!

Friday, September 4, 2009

Shaurya Kya Hai? (शौर्य क्या है?)

These lines are from the film "Shaurya". Javed Akhtar wrote these lines, and they are narrated by Shah Rukh Khan in the film's casting at the end.

शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फ़ौजियों की एक पलटन का शोर,
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शोर।

शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे,
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाइश।

शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास,
या शोलों की बरसात से पल भर में एक शहर को शमशान बना देने का एहसास।

शौर्य,
बहती बियास में किसी के गर्म खून का हौले से सुर्ख हो जाना,
या अनजानी किसी जन्नत की फ़िराक में पल पल का दोज़ख बनते जाना,
बारूदों से धुंधलाए इस आसमान में शौर्य क्या है?

वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य,
शायद एक हौसला शायद एक हिम्मत हमारे बहुत अंदर,
मज़हब के बनाए नारे को तोड़ कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत,
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती दे पाने की हिम्मत,
मरती मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत।

शौर्य,
आने वाले कल की खातिर अपने हिस्से की कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत।

शौर्य क्या है?

Wednesday, September 2, 2009

Shrapit Jeevan (श्रापित जीवन)

कन्या भ्रूण हत्या की असंख्य घटनाओं से द्रवित हो लिखी गई है ये कविता।

मैं अभी छोटी थी,
बहुत छोटी, नन्हीं सी।
मैनें कभी सूर्य के उजाले को,
देखा तक नहीं था।
ना ही कभी फूलों की खुशबू,
को महसूस किया था।

अभी बहुत कुछ करना था मुझे,
गुड्डे-गुड़ियों की शादी करनी थी,
घर-घर खेलना था।
जल्दी से बड़ा हो और,
खूब पढ़ाई कर,
डाक्टर बनना था।

पर शायद मेरे माँ-बापू,
भैय्या चाहते थे।
मेरे अंदर होने का जब उन्हें पता लगा,
उनका उल्लास काफ़ूर हो चला था।
और मेरे पैदा होने से पहले ही,
मुझे मार दिया गया।

मैं चीखी, चिल्लाई,
पर शायद किसी को भी,
मेरी सिसकी नहीं दी सुनाई।
आखिर मेरा कसूर क्या था,
जो मुझे खुले आसमान के नीचे,
साँस लेने से महरूम किया गया।

मरते मरते भी माँ-बापू,
मैं चाहती थी आपसे ये पूछना,
भैय्या की ही तरह क्यों नहीं दिया,
मुझे भी एक भय रहित उन्मुक्त वातावरण।
और आखिर क्यों दिया मुझे,
ऐसा अधूरा और श्रापित जीवन।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०२-०९-०९ 02-09-09

Tuesday, September 1, 2009

A Thousand Desires

These lines are narrated in one of the sound tracks of the film "Hazaaron Khwahishen Aisi". I found them amusing. The lyrics and narration is done by Mr. Pritish Nandy, the CEO of Pritish Nandy Communications. It is the same banner who produced the film.




A thousand desires such as these,
A thousand moments to set this night on fire.
Reach out and you can touch them,
You can touch them with your silences,
You can reach them with your lust.
Rivers, mountains, rain.
Rain against the torrid hill's cape,
A thousand,
A thousand desires such as these.

I loved rain as a child,
As a lost young man,
Empty landscapes bleached by a tired sun.
And then,
And then suddenly it came like
A dark unknown woman.
Her eyes scorched my silences,
Her body wrapped itself around me
Like a summer without end.

Pause me,
Hold me,
Reach me where no man has gone.
Crossing the seven seas,
With the wings of fire,
I fly towards nowhere.
And you,
Rivers, mountains, rain.
Rain against the scorched landscape of pain.

A thousand desires such as these,
A thousand moments to set this night on fire.
Reach out and you can touch them,
You can touch them with your silences,
You can reach them with your lust.
Rivers, mountains, rain.
Rain against the torrid hill's cape,
A thousand,
A thousand desires such as these.

Sunday, August 30, 2009

Premarth (प्रेमार्थ)

This poem is loosely based on "The Seven Stages Of Love" which I described earlier.

प्रेम का अर्थ जाने बिन,
कहते हैं लोग कि उन्हें भी,
बहना है प्रेम की धारा में,
रहना है प्रेम की छाया में।

आकर्षण की जिस आंधी को,
लोग प्रेम का नाम हैं देते,
वो न जाने असल प्रेम की,
छवि को धूमिल ही वो करते।

मोह की मदिरा में डूब,
क्या जानेंगे वो लोग,
कि आखिर किस एहसास में,
प्रेम छिपा है किस विश्वास में।

प्रेम तो है जैसे पवन,
जो निरंतर बहती है,
प्रेम तो है जैसे नदी,
जो कलकल करती चलती है।

प्रेम तो है जैसे पूजा,
जो कभी न खाली जाती है,
प्रेम तो है वो जुनूनी ताकत,
जो सदा ही हावी रहती है।

प्रेम तो है वो आशा,
जो मृत्यु के बाद भी जीवित है,
प्रेम की है यही परिभाषा,
जो ना समझे वो मूर्ख है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
३०-०८-०९ 30-08-09

Friday, August 28, 2009

Than Gayi! (ठन गई!)



This poem is written by ex-Prime Minister of India and an esteemed poet, Mr. Atal Bihari Vajpayee. During the period of Emergency (1975-77), he was put in to Bangalore Jail, where he fell extremely ill. He was then admitted to AIIMS, New Delhi where he wrote this poem.


ठन गई! मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उम्र क्या है?
दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी है सिलसिला,
आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया,
मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा,
कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव,
चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर,
फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर,
ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई,
रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, त्योरी तन गई।

ठन गई! मौत से ठन गई!


-अटल बिहारी वाजपेयी

Saturday, August 22, 2009

Is Baar Nahi (इस बार नहीं)

This poem was written by Mr. Prasoon Joshi after the Mumbai attacks of 26th November. I found it worth posting on my blog.

इस बार जब वो छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी
खरोंच ले कर आएगी,
मैं उसे फूँ फूँ कर नहीं बहलाऊँगा,
पनपने दूँगा उसकी टीस को,
इस बार नहीं।

इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा,
नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले,
दर्द को रिसने दूँगा, उतरने दूँगा अंदर गहरे,
इस बार नहीं।

इस बार मैं ना मरहम लगाऊँगा,
ना ही उठाऊँगा रुई के फाहे,
और ना ही कहूँगा कि तुम आँखें बंद कर लो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूँ,
देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव,
इस बार नही।

इस बार जब उलझनें देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा,
नहीं दौड़ूगा उलझी डोर लपेटने,
उलझने दूँगा जब तक उलझ सके,
इस बार नहीं।

इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औज़ार,
नहीं करूँगा फ़िर से एक नयी शुरूआत,
नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की,
नहीं आने दूँगा ज़िंदगी को आसानी से पटरी पर,
उतरने दूँगा उसे कीचड़ में, टेढ़े मेढ़े रास्तों पर,
नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून,
हल्का नहीं पड़ने दूँगा उसका रंग,
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार,
कि पान की पीक और खून का फ़र्क की खत्म हो जाए,
इस बार नहीं।

इस बार घावों को देखना गौर से,
थोड़े लंबे वक्त तक,
कुछ फ़ैसले,
और उसके बाद हौसले,
कहीं तो शुरूआत करनी ही होगी,
इस बार यही तय किया है।

-प्रसून जोशी

Wednesday, August 19, 2009

Dhoomketu (धूमकेतु)

This poem is dedicated to my good friend Sudhir Kumar, without whom it was never going to be complete.


पल में चमक पल में अंधकार,
क्षण में जीत क्षण में हार,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

अपने ही पथ पर घूमता,
जैसे हर घड़ी कुछ ढूँढता,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

अग्नि सा जलता तन,
अलाव की राख़ से आँसू,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

कुछ रास्ते छोड़ता कुछ रिश्ते जोड़ता,
तब भी अपने में सुलगता,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

परम सत्य की तलाश में,
झूठ से घायल आकाश में,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

देखा है मैंने धर्म को जलते हुए,
आस्था की आँच पर ईश्वर-अल्लाह को ढलते हुए,
अब ना जाने कितना जलेगा,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१९-०८-०९ 19-08-09

Punarjanm (पुनर्जन्म)

This poem is inspired by the book "Many Lives Many Masters" written by Dr. Brian Weiss. Also, this poem is dedicated to my dear friend Divyanshu Tripathi, who made me read that awesome book.


किसी विद्वान से सुना था मैंने कभी,
हर जीवित तन में है आत्मा का वास,
तन नष्ट हो जाते हैं फ़िर भी,
पहुँचे न आत्मा को क्षति कुछ खास ।

समय बदले तन बदले,
आज यहाँ कल वहाँ विराजे,
अलग योनि अलग रूप में,
हर बार संसार को साजे ।

परंतु कर्मों की छाया से,
हो उज्जवलित और धूमिल,
और सारे निर्णयों का फल,
हो अगले जीवन में शामिल ।

विरले होते हैं वो जिनको,
याद रहे ये अगला पिछला,
अपनी आप बीती सुनाने का,
मिले मौका ये निराला ।

कठिन है बहुत स्वीकारना,
इस जीवन-दर्शन को,
पर जिस क्षण हो एहसास,
संजोना उस पल को ।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१९-०८-०९ 19-08-09

Tuesday, August 18, 2009

Khushi (खुशी)

आज मेरे मन-मस्तिष्क में,
ये विचार कौंधा कि,
आखिर जिसे कहते हैं खुशी,
वो एहसास क्या है?

क्या वो क्षणिक आनंद,
जो हमें कभी मिला था;
उसे खुशी की श्रेणी में,
रखा जा सकता है?

या वो क्षणभंगुर नशा,
जो किसी जीत के बाद
चढ़ा था; वो खुशी की
गरिमा बढ़ा सकता है?

बहुत चिंतन के बाद,
निष्कर्ष ये निकला कि,
जो निश्चल और निरंकार है,
उसी में खुशी का सार है।

जिसका कोई अंत नहीं,
जिसे अमरता का वरदान है,
जिसे कोई बांध नहीं सकता,
वही खुशी का एहसास है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१८-०८-०९ 18-08-09

Saturday, July 25, 2009

Ragging - A Necessary Evil


After 3 years of college life and entering in the 4th year as the super senior in the college, it is indeed a moment of pride and happiness for me. But it is accompanied with a sense of responsibility. Now, we are the senior most of all and this means that we have no one to look out for us but ourselves and also we have to look out for all the juniors as well. But then, when everything is as crystal clear as that, where lies the damn problem? Let me show it to you. In common parlance it is known as 'Ragging' but I call it 'Attitude Adjustment'. Yes, the same old 'devil', which has haunted the colleges for years and will haunt them in future as well.

The Government, with the help of judicial system and college management has tried to curb this menace and is successful to a large extent. Now, after this decision that anybody found indulged in any form of ragging will be suspended from the college for life, and he/she will not get admission in any other college/university throughout the country, this 'djinn' is some how contained in its bottle. But, as they say, there are two sides of every coin and this one is no exception. People only saw the one side of the coin and passed their judgement on the basis of that.

I think, by stopping this 'evil' to the level of extent that a senior student is scared even to ask the name and background of a junior student in college premises is absurd. He is afraid he might be booked under the severe norms of ragging. The spirit of healthy interaction amongst students with different financial and social backgrounds is completely vanished. Now, no senior student is curious to know how many freshers came from his city this year. And not only is it social interaction, which is affected. The feeling of brotherhood is hampered to this extent that both seniors and juniors see the other guy with suspicion and do not want to be seen together.

The frequent visits to the seniors' rooms for help during the exams and project submissions do not happen any more as the 'bonding period' during which juniors came to know about the seniors has been banned. The honour and respect which the juniors used to give their seniors is no longer seen and which in the long run reflect in the lives of students, when they come out of the colleges in to the corporate world, and they are not used to give such respect to their bosses there. This could be a problem very well known as 'Attitude Problem'.

The bottom line is, as I see it, that physical or mental ragging in any form is not justified at all, and should be dealt with seriously. But social interaction and getting to know each other, to spread the word of friendship, brotherhood and love should not be prevented in order to curb ragging. There should be some border line to which it should be allowed. Otherwise, we will be developing a society of dumb people who will not be fit to work in a society with people different from themselves.

Sunday, May 24, 2009

Drive (ड्राइव)

This poem is written by one of my friends, Mr. Ghanshyam Das Ahuja, who lives in Navi Mumbai. It is written in context with the traffic police's drive against the vehicles which litter on the streets. It is indeed a realistic and motivating attempt.

ट्रेफ़िक पुलिस का ये ड्राइव यकीनन लाएगा रंग,
मानसून ही क्यों हमेशा यही रहे उमंग,
इसी संदर्भ में मेरा है एक बेशकीमती सुझाव,
दुकानदार जो करते हैं कचरा उन पर भी खाओ ताव।

कईयों को मैंने कचरा फेंकते देखा है,
देखा ही नहीं कई बार उन्हें टोका है,
पर जब तलक पड़ेगा नहीं कानून का डंडा,
साफ़ सुथरी रोड के बजाय माहौल रहेगा गंदा।

पार्क/गार्डन में जो लोग करते हैं कचरा,
उन लोगों से है हमारे समाज को खतरा,
काश हर इंसान सलीके से रह सबकी सोचता,
मैं ये कविता ना लिख कुछ और सोचता।

-घनश्याम दास आहुजा

Thursday, May 21, 2009

Monday, May 18, 2009

Haara Nahi Mai (हारा नहीं मैं)

Today I was browsing through election news on rediff.com and found this awesome poem in the discussion board segment. It was so good that I could not resist sharing it with you. The poet did not give the title so I gave it one. The name of the poet is Deepank Singhal (as flashing on rediff.com). I assume he wrote it himself and did not copied it from some where which makes him the poet.

हैरान हूँ मैं, पर हताश नहीं हूँ,
परेशान हूँ मैं, पर निराश नहीं हूँ।
फ़िर उगेगा सूरज, पर दिशा अलग होगी,
फ़िर बहेंगी नदियाँ, पर राह अलग होगी।
फ़िर चहचहाएँगे पक्षी, पर चहचहाहट अलग होगी,
फ़िर खिलखिलाएँगे बच्चे, पर खिलखिलाहट अलग होगी।
फ़िज़ा बदलेगी, हवा बदलेगी,
आने वाली सुबह, देश का समां बदलेगी।
आज मैं हारा नहीं हूँ, बस मेरा ’हार’ गया है,
कल मैं फ़िर जीतूँगा, ये वक़्त मुझसे कह गया है।
बदलाव तो विकास का प्रतीक है,
प्रयोग तो लोकतंत्र की नींव है।
करने दो प्रयोग उन्हें, ज़रा वो भी आज़मा लें,
इसी में भारत की जीत है, इसी में मेरी जीत है।

- दीपांक शिंघल

Sunday, May 17, 2009

Aaj Jaane Ki Zid Na Karo (आज जाने की ज़िद ना करो)

This beautiful ghazal was sung by renowned Pakistani ghazal singer Fareeda Khanum. This is one of her master-piece and was duplicated several times all over the world. Asha Bhonsle also sung it for a music album. Most recently, the original version of this ghazal was used in the movie Monsoon Wedding by Meera Nair. Here are the lyrics (which was originally given by Fayyaz Hashmi) for this evergreen and legendary ghazal which has stolen my heart for quite some time now.

आज जाने की ज़िद ना करो,
यूँ ही पहलू में बैठे रहो,
आज जाने की ज़िद ना करो,
हाय मर जाएंगे,
हम तो लुट जाएंगे,
ऐसी बातें किया ना करो,
आज जाने की ज़िद ना करो।

तुम ही सोचो ज़रा,
क्यों ना रोके तुम्हें,
जान जाती है जब,
उठ के जाते हो तुम,
तुम को अपनी कसम जाने-जां,
बात इतनी मेरी मान लो,
आज जाने की ज़िद ना करो।

वक्त की कैद में,
ज़िंदगी है मगर,
चंद घड़ियाँ यही हैं,
जो आज़ाद हैं,
इन को खो कर मेरी जाने-जां,
उम्र भर ना तरसते रहो,
आज जाने की ज़िद ना करो।

कितना मासूम,
रंगीन है ये समां,
हुस्न और इश्क की,
आज में राज है,
कल की किसको खबर जाने-जां,
रोक लो आज की रात को,
आज जाने की ज़िद ना करो।

आज जाने की ज़िद ना करो,
यूँ ही पहलू में बैठे रहो,
आज जाने की ज़िद ना करो,
हाय मर जाएंगे,
हम तो लुट जाएंगे,
ऐसी बातें किया ना करो,
आज जाने की ज़िद ना करो।

Wednesday, May 13, 2009

Hum (हम)

मैं और तुम,
हम दोनों,
दुनिया की नज़र में,
दो अलग जिस्म,
दो अलग जान हम।

तुम शायद ना जानो,
शायद ना मानो,
कि हम बने हैं साथ
रहने के लिए,
साथ जीने के लिए।

मेरी आँखें खुली हैं सदा,
इसी इंतज़ार में कि कब,
तुम्हें इल्म हो कि अब,
हम एक हो यही सही है,
वक्त की ज़रूरत है।

कोई गम नहीं मुझे,
अगर वक्त मेरा साथ ना दे,
मोहब्बत में शर्त कैसी?
ये तो है एक पाक एहसास,
जो है ना किसी का मोहताज़।

मुझे फ़िक्र नहीं दुनिया की,
यहाँ सब मतलब के साथी,
अगर हम साथ तो,
हर मुश्किल हर परेशानी,
फूलों की सेज सरीखी।

तुम बस एक बार एक नज़र भर,
कह दो कि मैं और तुम अब हैं हम,
तुम्हारी कसम,
उस पल से पुराने सब किस्से खत्म,
और नए आयाम छूने उड़ चले हम।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१३-०५-०९ 13-05-09

Tuesday, May 5, 2009

Jeevan-Darshan (जीवन-दर्शन)

लोग पूछें रे ये बतलावो,
जीवन-दर्शन ये क्या बला है?
आखिर किसने इधर-उधर कब,
कौन नया रूप ढला है?

सबरे पूछें हैरत के मारे,
ऐसा कैसा ये खेल भयो?
कौन खिलाड़ी इसका है,
और कौन खिलाने वाला है?

मैं बोलयो रे मूरख प्राणी,
ये क्या पूछ लिया तूने?
इसका उत्तर देवे ऐसा,
कोई क्या कभी बना है?

संत महात्मा साधू राजे,
सबरे हारे इसके आगे,
हम तुम तुच्छ प्राणी,
भला कहाँ ठहरेंगे सारे?

आज ये समझो बस तुम इतना,
खेल खिलावे ऊपर वाला,
नियम कायदे सारे उसके,
खेलन वाले हम सब सारे।

इस खेल का एक नियम है,
जो खेले सो हर दम हारे,
गर कभी कोई जीत जावे,
"उसका" अवतार होगा वो प्यारे।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०५-०५-२००९ 05-05-2009

Wednesday, April 29, 2009

Kahin Door Jab Din Dhal Jaaye (कहीं दूर जब दिन ढल जाए)

Movie: Anand
Singer: Mukesh
Lyrics: Salil Chowdhury
Actor: Rajesh Khanna


कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए,
मेरे ख्यालों के आँगन में,
कोई सपनों के दीप जलाए,
दीप जलाए,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए...

कभी यूँ ही जब हुयीं बोझिल साँसें,
भर आयीं बैठे बैठे जब यूँ ही आँखें,
कभी यूँ ही जब हुयीं बोझिल साँसें,
भर आयीं बैठे बैठे जब यूँ ही आँखें,
कभी मचल के, प्यार से चल के,
छुए कोई मुझे, पर नज़र ना आए,
नज़र ना आए,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए...

कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते,
कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते,
कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
है मीठी उलझन, वैरी अपना मन,
अपना ही हो के, सहे दर्द पराए,
दर्द पराए,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए...

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे,
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे,
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यहीं तो हैं अपने,
मुझसे जुदा ना होंगे, इनके ये साए,
इनके ये साए,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए,
मेरे ख्यालों के आँगन में,
कोई सपनों के दीप जलाए,
दीप जलाए,
कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए...

Tuesday, April 14, 2009

Cricket Mania


There are very few things in India which are not affected by the recent economic slowdown or recession or meltdown, occurrence of natural disasters or any man-made tragedies. They go on for ever. Other than Bollywood and Politics, one such thing is Cricket. People here in India are just crazy about it. They might even not be knowing the names of the players playing for the national teams of other sports such as hockey, football or basketball etc. but can easily give you the full description of every cricketer playing in national team with all the brief statistics related to him. Such is the madness for the sport down here.

This was not the case from the beginning. In fact Cricket was a 'dying' sport as people were loosing interest in it. The Test Cricket format i.e. the purest form of the 'Gentlemen's Game', which stretched for five days, was killing the fan following because people could not find time to watch it continuously for six hours a day, for five days. Other sports such as hockey or football are finished well under 2-3 hours and because of their fast pace, the excitement lasts throughout the match. This was missing in Cricket and was the biggest drawback of this format of the sport. So in a desperate attempt to save Cricket, the big guns of the sport came up with new and unique format.

This format was the One Day International or the ODI (50-over game each side) and was introduced in early 70's. To promote it, the ICC organized a World Cup in 1975, in which all test playing nations and few associate members participated. That trend is religiously followed till date every four years. In India, Cricket regained its glory after their World Cup win in 1983. Since the beginning of this format, much new advancements are made, many new rules were introduced. Many wonderful techniques for the TV coverage were introduced so that public can have a better understanding of the sport. Players started playing in colorful attires adding in to the excitement. They started playing in the evening under artificial lights so that more spectators can enjoy the sport after hours. These all efforts were made to spice up the sport from time to time. But after around thirty years of its successful run, people started getting bored and found it tedious again, as it also took around eight hours. So, the spectators again started to drift away from the sport. Cricket needed a boost again and this time it was difficult job. But the big guns struck again and came up with yet another revolutionary format.

This format was known as Twenty-Twenty or T20 (20-over game each side). This format revolutionized everything. The sport which was once known for its decency has now changed so much, that it is difficult to recognize the good old Cricket. More money than ever, glamour, pomp and show, cheerleaders, franchisee teams in which players from all nations play together and against each other. Amongst all this, I feel the real spirit of the sport is somewhat vanished. I sometimes wonder if Test Cricket was considered to be a Bollywood actress of the 50's clad in a saaree and ODI was like an actress of the 90's wearing skimpy outfit, then T20 would be like today's model showing off in a bikini (No offence but it is true).

But I still believe that this change is of some worth. Not because it did something good for the sport in itself, but because this change gave the people at least one more reason to cheer, to have fun, to dance to the tune of any boundary or six hit and just forget about their tension and miseries of the life for at least some time. Although I still believe that Test Cricket is the best form of the sport but we all should respect the change and enjoy the upcoming Indian Premiere League Season 2 followed by the T20 World Cup 2009 with full enthusiasm as before.

Monday, April 13, 2009

A Soldier's Life


I recently watched the movie 'We Were Soldiers' which inspired me to write this article.

Right from the ancient period, foreign invaders and rulers were attracted towards the riches of the Indian civilization and constantly tried to invade Indian soil. This resulted into insecure borders and in order to counter these attackers, the rules of various provinces in India took hefty measures by deploying huge army with large number of soldiers. More over, there were feuds amongst the local rulers as well from time to time, and thus to cope with rivals, they needed to be prepared for a prospective war any time. Hundreds of wars were fought since then which resulted in the deaths of millions of soldiers who fought for the pride and honor of their country and its rulers. Talking of today, wars happen now as well, but fewer in frequency. But the causality in terms of lives and money is immense when compared to the past.

Skipping all that which is buried under the layers of time, today I just want to discuss about the present scenario of wars and soldiers who are involved in them. And by soldiers, I not only mean Indian soldiers deployed on the Kashmir border, but to all those soldiers who are fighting for their country around the globe. Now, just for a moment, imagine a war scene. Two soldiers from rival armies are fighting with each other. One even don't know the name of that person with whom one is fighting. In fact, there is a big possibility that one don't even know the exact reason why one is trying to kill the other one. Just because somebody sitting in the administration pointed him towards a certain section and stated that they are the enemies, and ordered them to shoot the person from that section. That administrator might have some political or financial benefits out of the war, but he tries to pretend to be concerned about the security and integrity of the country. So, thousands of soldiers of his army and the rival's were butchered to fulfill the whims and fancies of the administrator. Again, consider this, those two guys are not on the war front (they still don't know each other). They meet in some club or social gathering. Possibility is that, they might end up being friends of each other, sharing a drink or two. Human tendency facilitates them to interact with each other.

These were the two aspects which I wanted to highlight. But, on a more realistic note, what about these soldiers after the war is over? Many of them die and thousands are left disabled, making them useless for any physical activity. What about their family? Who will take care of them now? Governments announce some nominal pension for their families, which is in no way sufficient for their survival. The whole point is, wars are not the only alternative to settle a disagreement. In order to prevent the massacre, one should think of other alternatives. Political interests should not come in the way of the right of the citizens to live in a peaceful environment. And the soldiers are not the only ones who die. The innocent citizens from both sides also face the fallacy and their scars from the war never fade. Therefore, I appeal to all the governments, rulers, administrators who are currently into wars or facing a war-like situation or fueling them in any way, to think over the humanitarian aspect of living and stop the barbaric act of destroying the human civilization.

Saturday, April 11, 2009

Aakhiri Faisala (आखिरी फ़ैसला)

ये कहानी प्रेरित है एक सच्ची घटना से जो कुछ साल पहले कोलकाता में घटी थी। मुझे इसका पता अखबारों से लगा था और तब मैंने इस बारे में विचार किया कि ऐसा हुआ तो आखिर क्यों? कहानी के किरदार असल ज़िंदगी से लिए गए हैं और उनके साथ जो कुछ हुआ वो भी असलियत है, बस उसको प्रस्तुत करने के काम में मुझे अपनी कल्पना के मोती भी जोड़ने पड़े हैं।

हमारी कहानी के मुख्य पात्र एक सेवानिवृत सरकारी कर्मचारी हैं, जो कि अपने कार्यकाल में अपनी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके साफ़ सुथरे व्यक्तित्व का सब आदर करते थे। उनकी पत्नी एक सीधी साधी और पूजा पाठ करने वाली साधारण महिला थी। वे ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं परंतु अपने श्रीमान के साथ हर सुख दुख में डट कर साथ खड़ी रहीं और अपने पति के हर फ़ैसले का सम्मान किया। वैसे उन दोनों को किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थी, परंतु अगर कुछ नहीं था उनके पास तो कोई ऐसा जिसे अपनी औलाद कह सकें। बहुत सालों पहले उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी पर वो बेचारा कुछ महीनों में ही भगवान को प्यारा हो गया। आज अगर होता तो कोई २४-२५ वर्ष का होता। उसके जाने के बाद श्रीमति जी ने हर संभव प्रयास किया कि उन्हें ये सौभाग्य प्राप्त हो पर कोई खास परिणाम नहीं निकला। बहरहाल, दोनों ने अब तक किसी तरह एक दूसरे के सहारे जीवन यापन किया। पर कहीं न कहीं एक कसक दिल में बाकी रह ही गई, कि जीवन भर जो इतनी मेहनत की, वो किस काम की, जब कोई वारिस ही नहीं, कोई ऐसा ही नहीं जिसे अपना कह सकें, जिसे प्रेम से गले लगा सकें। कोई ऐसा है ही नहीं, जो राम जी के पास पहुँचने पर उनकी चिता को अग्नि भी दे सके।

सेवानिवृत जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि ना चाहते हुए भी मन उन बातों की तरफ़ भटकता है जिनके बारे में सोचने से पीड़ा होती है। और स्थिति की विडंबना ये है कि जब हम कामकाज में व्यस्त होते हैं तो सोचते हैं कि कब इस सब से छुट्टी मिले तो कुछ आराम किया जाए। बस इसी विकट समस्या ने हमारे मुख्य पात्र को घेर रखा था। श्रीमति जी तो फ़िर भी ईश्वर के चरणों में समर्पित थीं तो उनका समय कट जाया करता था, परंतु श्रीमान क्या करें? कोई पुराना शौक भी नही जिससे दिल बहला लें। बस अब रह रह के यही ख्याल आता कि अब जियें तो किसके लिए। ऐसे ही एक अलसाई सुबह श्रीमान जी उठे, तो थोड़े विचलित थे। श्रीमति जी का ध्यान उस ओर गया पर उन्होंने उनसे इस बारे में कुछ भी नहीं पूछा। तीस साल साथ रहने के बाद आपको अपने साथी के स्वभाव का बखूबी अंदाज़ा लग जाता है। वो जानती थीं कि आज कल श्रीमान की मनोस्थिति कैसी चल रही है, इसीलिए उन्होंने उनको उनके हाल पर छो़ड़ना ही उचित समझा। परंतु शाम होते होते बात अपने आप ही साफ़ हो गई। श्रीमान जी उनके पास आए और बताया, "आज सुबह से ही मेरा मन बड़ा विचलित है। मुझे एक अजीब सी जकड़न महसूस हो रही है जो मुझे चैन नहीं लेने दे रही। भीतर कुछ ऐसा है जो मुझे मन ही मन कचोट रहा है। असल बात यह है कि अब मेरी जीने की इच्छा समाप्त हो गई है।" पूरी बात सुन श्रीमति जी परेशान हो उठीं। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो श्रीमान जी को कैसे समझायें। खैर उन्होंने अपने पति से कहा, " देखिये, बीती बातों को भूल जाइए और अपने बाकी के जीवन को, जो है उसी में गुज़ारने की कोशिश कीजिए।" बात आयी गयी हो गई।

इस बीच श्रीमान जी का मन अब पूरी तरह उखड़ चुका था। उनके मन में तरह तरह के विचार पनपने लगे। उनके दांपत्य जीवन पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ा और वो अपनी पत्नी को, जिनसे उन्होंने इससे पहले कभी ऊँची आवाज़ में बात तक नहीं की थी, बात बात पर झिड़क देते। शायद उन्हें ये गलतफ़हमी हो गई थी कि कहीं न कहीं उनकी इस अवस्था का कारण उनकी पत्नी भी हैं। अब उन्हें ये कौन समझाये कि होनी को जो मंज़ूर था वही हुआ, इसमें बेचारी श्रीमति जी का क्या दोष? पर इतना सब होने के बाद भी बेचारी ने उफ़ तक नहीं की। शायद उन्होंने इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया था। दिन गुज़रते गए और हालात बद से बदतर होते रहे।

एक शाम श्रीमान जी अपनी पत्नी से बोले, "देखो भाग्यवान, आज हावड़ा ब्रिज घूमने चलते हैं। सैर की सैर हो जाएगी और मन भी बहल जाएगा।" श्रीमति जी अचानक आए इस परिवर्तन से बहुत प्रसन्न हुयीं। उन्हें लगा कि शायद अब श्रीमान जी पहले की तरह ही सामान्य हो रहे हैं और उन्होंने अपने कष्टों से समझौता कर लिया है। वे तुरंत राज़ी हो गयीं और जल्दी से तैयार हो कर चल पड़ीं। परंतु उन्हें अपने पति के इरादों का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था। इस घूमने ले जाने के पीछे एक बड़ा राज़ छिपा था। हावड़ा ब्रिज पहुँचने पर श्रीमान जी ने अपने इरादे ज़ाहिर किए। वे बोले, " मैं आज यहाँ अपना जीवन समाप्त करने आया हूँ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब मेरे जीने का कोई औचित्य नहीं बनता। मैं जिन भी कामों के लिए इस दुनिया में आया था वो पूरे हो चुके हैं और अब मैं ये संसार त्यागना चाहता हूँ। मैं ये भी चाहता हूँ कि जैसे तुमने अब तक किए गए मेरे सारे फ़ैसलों में मेरा साथ दिया है, इस आखिरी फ़ैसले में भी मेरा साथ दो। मैं तुमसे अभी भी उतना ही प्रेम करता हूँ जितना कि पहले करता था। मैंने पिछले कुछ समय में नासमझी में कुछ गलत कहा हो या किया हो तो मुझे माफ़ कर दो।" ये सब सुन कर श्रीमति जी सकते में आ गयीं। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि श्रीमान जी ऐसा कदम उठाने की भी सोच सकते हैं। उन्होंने रोते हुए कहा, "प्रिय, आप ऐसी बातें न कीजिये। मेरा आपके सिवा और कोई नहीं है। क्या आपने ये भी नहीं सोचा कि आपके बाद मेरा क्या होगा? मैं आपके बिना एक पल नहीं रह सकती। मैं आपको ये कदम उठाते नहीं देख सकती।" इस पर श्रीमान जी बोले, " मेरे पास और कोई रास्ता नहीं हैं। मैं अब एक पल नही रह सकता। मुझे मेरे फ़ैसले पर अमल कर लेने दो और तुम घर वापस लौट जाओ।" फ़िर कुछ सोचने के बाद श्रीमति जी ने कहा, " ठीक है। अगर आप अपनी बात पर अडिग हैं तो मैं भी अचल हूँ। पूरा जीवन आपके साथ बिताने का वचन दिया था तो आपके साथ मरने को भी तैयार हूँ। वैसे भी आपके अलावा मेरा ना कोई ओर है ना छोर। मैं भी आपके साथ अपना जीवन समाप्त करना चाहती हूँ"। अब रोने की बारी श्रीमान जी की थी। उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि श्रीमति जी ऐसा कुछ करने को तैयार हो जाएँगी। उन्होंने बहुत समझाया पर वो नहीं मानी। आखिरकार दोनों ने ही पुल से छलांग लगा दी।

कहानी यहीं खत्म हो जाती तो मुझे थोड़ा कम दुख होता। पर आगे की बात जान कर कलेजा मुँह को आ गया। नदी में कूदने पर श्रीमान जी का सामना जब सचमुच की मौत से हुआ तो उनको पता चला कि अपनी जान देना इतना आसान काम नहीं है। कहाँ तो वो इतने दिनों से प्राण त्यागने की बात सोच रहे थे और कहाँ अब उनके मन में किसी तरह से बचने का ख्याल आ गया। वे तैरना जानते थे, इसीलिये किसी तरह से किनारे तक आ गए। परंतु श्रीमति जी के शरीर को अगले दिन गोताखोरों की मदद से ही निकाला जा सका। नदी किनारे अपना सिर पकड़े श्रीमान जी बैठे हैं और सोच रहे हैं कि उन्होंने ये आखिरी फ़ैसला आखिर क्यों लिया? पहले वो तन्हा थे, अब... पहले से भी ज़्यादा...

Wednesday, April 8, 2009

Hothon Se Choo Lo Tum (होठों से छू लो तुम)

Jagjit Singh belongs to an elite class of singers whose work cannot be reviewed, rated or compared to anybody else's work. He is a maestro and has his own league. But if I somehow weight his entire work and was to pick one ghazal of all times, I will choose ’होठों से छू लो तुम’. It is my personal favorite. This ghazal was originally sung for the movie 'Prem Geet' released in 1981. The song was pictured on Raj Babbar, as he sings it in a party. After that, it became so popular that no live concert of Jagjit Singh is completed without the request for this one. Here is the lyrics which was originally given by Indeevar (1924-1999). Enjoy and be mesmerized by the magic of the words.

होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।

ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन।
ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन।
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन।
नई रीत चला कर तुम, ये रीत अमर कर दो।
नई रीत चला कर तुम, ये रीत अमर कर दो।

आकाश का सूनापन, मेरे तन्हा मन में।
आकाश का सूनापन, मेरे तन्हा मन में।
पायल छनकाती तुम, आ जाओ जीवन में।
साँसें देकर अपनी, संगीत अमर कर दो।
संगीत अमर कर दो, मेरा गीत अमर कर दो।

जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा।
जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा।
सब जीता किए मुझसे, मैं हर दम ही हारा।
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो।
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो।

होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो।

Wednesday, April 1, 2009

Mahasangram - 2009 (महासंग्राम - 2009)

एक समय था जब भारतीय राजनीति की पटकथा बहुत सरल, सुलझी और साफ़ हुआ करती थी। बड़े राष्ट्रीय दलों के नाम पर सिर्फ़ कांग्रेस का ही बोलबाला था और हर लोकसभा चुनाव में उन्हें 543 में से 300-350 सीटें मिलना एक आम बात थी। फ़िर 1977 में स्थिति कुछ हद तक बदली जब 1975 में इंदिरा सरकार द्वारा लगाया गए आपातकाल के बाद लोकसभा चुनावों में सभी छोटे दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस के खिलाफ़ मोर्चा खोला। तभी भारतीय लोक दल (बाद में जनता पार्टी) का जन्म हुआ। उनके रूप में आपातकाल की त्रासदी झेल चुकी जनता को आशा की एक नई किरण दिखाई दी। उनका रोष आंदोलन में बदल हो गया और जनता ने कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फ़ेंका। उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, गुजरात, उड़ीसा इत्यादि राज्यों में कांग्रेस एक सीट भी नहीं जीत पाई। यहाँ तक कि श्रीमती इंदिरा गांधी भी अपनी चिरपरिचित सीट रायबरेली से हार गयीं। उनके पुत्र और उस समय के कद्दावर नेता संजय गांधी भी अमेठी सीट से मुँह की खा गए। भारतीय लोक दल को बहुमत प्राप्त हुआ और उन्होंने सरकार बनाई। पर ये सरकार ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाई क्योंकि कुछ ही समय में भारतीय लोक दल के सदस्यों के आपसी मतभेद सतह पर आ गए। इसका ये नतीजा हुआ कि 1980 में फ़िर से चुनाव हुए और उसमें कांग्रेस की बड़ी जीत हुई। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के चलते जो सहानुभूति की लहर उठी, उसकी वजह से कांग्रेस एक बार फ़िर धमाकेदार जीत के साथ वापस आई।

बस उस चुनाव के बाद आज तक कभी भी कोई बिना गठबंधन स्थाई सरकार नहीं बन पाई। 1989 से लेकर 2004 तक छह लोकसभा चुनाव हुए। हर बार कुछ नए समीकरण उभर के सामने आए। कोई भी दल बहुमत प्राप्त नहीं कर पाया और उसकी वजह से गठबंधन सरकार का दौर चल गया जो अब तक बदसतूर जारी है। इसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय दलों की लोकसभा चुनावों में बढ़ी भागेदारी है। जब क्षेत्रीय दल अपने अपने राज्यों में सीटें जीतने लगे तो उसका दुष्परिणाम ये हुआ कि चुनाव बाद गठबंधन में सांसदों की खरीद-फ़रोख्त बहुत बढ़ गई। 1996 के बाद हुए चुनाव इसका प्रमाण हैं।

आज (2009) की स्थिति ये है कि बड़े राष्ट्रीय दल जैसे कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ चुनाव पूर्व हाथ मिलाना पड़ रहा है। उन्हें इन दलों के साथ विभिन्न राज्यों में सीटों का बंटवारा करना पड़ रहा है और साझा उम्मीदवार खड़ा करने की कवायद शुरू हो चुकी है। इसमें कोई गलत बात नहीं है परंतु जब ये क्षेत्रीय दल अपने समर्थन के बदले आर्थिक लेनदेन और मंत्री पद की लालसा व्यक्त करते हैं तो ये गठबंधन एक गंदी राजनीति का रूप ले लेता है। और इस खरीद-फ़रोख्त और बंटवारे का मौकापरस्त नेता खूब लाभ उठाते हैं। उदहारण के तौर पर लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान 1999 की भाजपा शासित राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार में मंत्री थे। फ़िर 2004 के चुनावों के बाद वे कांग्रेस शासित संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में भी मंत्री हैं। है ना कमाल? ऎन मौके पर पाला बदल कर दोनों हाथों में लड्डू लिए पिछले दस सालों से मौज कर रहे हैं। शायद इसी को कहते हैं दसों उंगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में।

अब सवाल उठता है कि इस समस्या का समाधान क्या है? किसी भी दल के चुनाव लड़ने के मौलिक अधिकार को तो छीना नहीं जा सकता। पर समझदारी से मतदान तो किया ही जा सकता है। आम जनता को चाहिये कि वो अपने बुद्धि-विवेक से मतदान करे और ऐसे उम्मीदवार को जिताए जो दल-बदल की राजनीति में विश्वास ना रखता हो। ऐसा करने से स्थिति में सुधार होगा और चुनाव बाद की खरीद-फ़रोख्त पर लगाम लग सकेगी। साथ ही देश को एक गंभीर और स्थिर सरकार मिलेगी जो देश की समस्याओं को सुलझाने में ज़्यादा सक्षम होगी। तो आने वाले लोकसभा चुनाव-2009 में अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग समझदारी से आँख-कान और बुद्धि के पट खुले रख कर करें और देश एंव समाज के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाहन करें।

जागो रे!!!!!

Tuesday, March 31, 2009

Subah (सुबह)

मेरे प्रिय मित्र मुदित सिंह को समर्पित। भगवान उसे सदबुद्धि दे।

अलसाई सी सुबह में अंगड़ाई लेता कोई,
और उसकी अधखुली आँखों में,
नए दिन के लिए देखे सपनों की झलकी,
याद दिलाती उसे कि आज फ़िर उसकी,
मंज़िल काफ़ी दूर अपना डेरा है डाले बैठी।

मंज़िल की चाह में फ़ुर्ती से उठ बैठा वो,
शीघ्रता से मन को किया कड़ा,
और सुबह की हसीन नींद के आनंद को त्यागा,
उस निश्चल निर्विघ्न नदी की भांति,
जो सागर से मिलने से पहले दम भी नहीं भरती।

आज उसकी वो मेहनत रंग लाई और वो,
कामयाबी की ऊँचाइयों को छूता हल्के से मुस्कुराता,
बीते दिनों की यादों में खोता यही सोचता,
कि कहीं उस रोज़ वो आलस कर बैठता,
तो आज ये हसीन मंज़र उसे ताउम्र नसीब न होता।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
३१-०३-२००९ 31-03-2009

Monday, March 30, 2009

Mood Swings


'Mood Swing' refers to a state of mind in which one's behavior changes from one state to another rapidly and in an unexpected way. This is a very frustrating yet interesting phenomenon which I am observing in me. This phase shift in my life sometimes leads to many behavioral disasters. One moment, I am happy thinking about something or somebody close to me, the other moment, a sad annoying thought from my past grapples my attention leaving me in an absolutely different mood.

Lately, this is one of my personality traits and thus, my point of concern. Why? Let me explain you with some real life example. Consider this, I am with my friends hanging out and having fun. Suddenly, one of my friends plays a prank on me, on which otherwise I would have laughed it off with all others. But now days, it happens that I freak out over such incident. This causes an adverse effect on my friendship with that guy. Also, the jovial environment in which we were before is completely ruined. Perhaps this happens because of some bad or painful memory attached to that similar prank or incident.

Until now, this trait was affecting my relationship with other people, and because of this I was falling short of trustworthy friends. But the problem worsens when it affects my physical or mental capability. Because of this, I fail to meet my academic deadlines, which directly affect my grades. When my mood is good, I can work twice of what I can normally perform. During this course I feel hearty and satisfied. But sometimes, when my mood is bad, I falter doing simple jobs, which in turn frustrates me and I falter more. Then comes the stage of deadlock and I finally succumb to the situation. The worst part is that these mood swings can be triggered by trivial issues like the loss of Indian Cricket Team, a bad day in college, degraded quality of mess food, or feeling ignored by people who are special to me.

If someone has a suggestion for me; how to counter this problem or you have an idea how to eliminate this, please leave that suggestion in the form of comments. I will be highly grateful.

Friday, March 27, 2009

Why UPA Should NOT Return To Power

Results of General Elections in 2004 were a shock to most of the political analysts, who predicted a thumping win of BJP-led National Democratic Alliance (NDA) Government. But it was the Congress-led United Progressive Alliance (UPA) who won the Elections and formed the Coalition Government under Dr. Man Mohan Singh (MMS). I, on my personal behalf, was doubtful whether this coalition will last five years of their tenure smoothly, because of the vested interests of various different poles of Indian Politics with different ideologies came together (e.g. Communists supported UPA from outside). But they proved me wrong by completing their tenure, although in the later half Communists withdrew their support over Nuclear Deal with the US, leaving MMS in a state of dilemma. Whatever be the case, if we observe the overall performance of the UPA Government, they will get a negative review all the way long. Perhaps MMS was the weakest PM India has ever seen. He failed on every front. Below are the various reasons why I think UPA should not return to power.

1. TERRORISM: This is perhaps the biggest issue in their tale of failures. UPA scrapped the Prevention Of Terrorism Act (POTA) formed by NDA as soon as they gained charge. This resulted into increase in terrorist activities throughout the country with exponential rate. Deaths due to terrorist attacks were at all time high and Mumbai terror attack of 26/11 was termed as the worst attack ever in the history. New targets in the form of small cities were formed by terrorists and every now and then there was chaos. The police and Intelligence agencies were feeling helpless in front of these cruel 'Death Traders'.

2. PRICE HIKE: The prices of every commodity increased to its maximum level ever during these past five years. Rate of Inflation rose to new heights breaking the backs of common man. Government was unable to control it. The basic food items like grains, fruits, spices etc. were out of the reach of the public. Interest Rates for Home Loans etc. increased drastically and the middle class felt the heat of it.

3. VOLATILE MARKET: Unscrupulous speculation and predictions by the Finance Minister (FM) led to more volatile share markets. First, it rose to its new heights which attracted scores of new investors. But due to loose policies it came down crashing causing millions of investors to loose their hard earned money. Many suicide cases all over the country were observed due to loss in shares. Many people lost their jobs because of resource shredding followed by companies to match their losses. FM was unable to stabilize markets and every measure he took to improve conditions backfired.

4. CASTE BASED RESERVATION: I strongly believe that if this stunt of 'vote politics' did not happen, I would not have been ended up rotting in JIIT. Reservations in Higher Education Entrance Exams and Jobs on the basis of caste led to many violent protests all over the country, but our HRD minister did not change his decision. Perhaps he was eyeing the long term political benefits. This decision increased the hatred among the different sections of society which is divided on the basis of caste. I believe this Jinn of Reservation which was released can prove to be the last nail in the coffin of UPA.

5. DUMMY PM: The funniest part of the tale is the formation of MMS as PM. After their win in the Elections in 2004, speculations were made that the next PM will be Mrs. Sonia Gandhi (SG), although protests in other political arena over her foreign origin was vibrant. She shocked the world by stepping aside stating 'her inner voice' and appointed MMS to take charge. No one had thought of her long term plan to place MMS as a dummy PM and gaining the title of 'Raajmata' alongside. In reality, the Government acted from 10, Janpath (Residence of SG) and MMS proved to be a 'Rubber Stamp' PM. The best example of his Political Impotency was the 'Cash For Vote' scam where in their desperation to save the government after Communists left, they allegedly purchased the MPs from other parties to vote in their favor when No-Confidence Motion was forced. They ended up somehow saving their government, but it was pathetic.

After all these reasons which I just stated, I don't think there is any need to explain any more. I believe every reader, or every citizen who is eligible to vote is directly or indirectly linked to any or all of these reasons. So, when you go to vote, keep these reasons in mind and choose the worthier candidate.

Comments Invited.

Thursday, March 26, 2009

Giddh (गिद्ध)


The recent incidences which occurred in our campus' hostels inspired me to write this story.

एक समय की बात है, एक शहर के गिद्धों में भुखमरी फैली थी। गिद्धों का राजा हैरान, परेशान। ऐसी स्थिति उसकी समझ से परे थी। उसकी प्रजा में हाहाकार मचा था और वो बेबस हो इधर उधर टहल रहा था। तभी उसे अपने मंत्रियों की याद आई। उसने एक आपातकाल बैठक बुलाने की सोची। आनन-फ़ानन में सभी मंत्रियों को संदेश भेज कर बुलवाया गया। राजा ने सभी मंत्रियों के सामने स्थिति की गंभीरता का जायज़ा लिया और सभी से इस बारे में उपाय करने की अपील की। अंत में एक मंत्री ने इस विकट परिस्थिति से निपटने का उपाय सुझाया। पूरा उपाय सुनने के बाद सभी उपस्थित गिद्धों ने सहमति जताई और बैठक खुशी खुशी संपन्न हुई।

अगले दिन मुँह अंधेरे कुछ गिद्धों ने शहर की तरफ़ प्रस्थान किया और वहाँ बीचों-बीच स्थित मनुष्यों के एक समुदाय के प्राथना स्थल को अपने पंजों और चोंचो से क्षतिग्रस्त कर दिया। दूसरी ओर कुछ और गिद्धों ने एक दूसरे समुदाय के प्राथना स्थल के साथ भी ऐसा ही किया। काम निपटाने के बाद सभी गिद्ध अपने ठिकानों पर जाकर बैठ गए और सुबह होने का इंतज़ार करने लगे।

सुबह हुई तो शहर में तबाही का मंज़र था। दोनों समुदाय के मनुष्य आपस में ऐसे मार-काट कर रहे थे जैसे उन्हें बरसों से इस दिन का इंतज़ार हो। चारों ओर अफ़रातफ़री का माहौल था। कुछ ही देर में पूरे शहर की गलियाँ मनुष्यों के लहू से लाल थीं। हर तरफ़ एक भयभीत कर देने वाला सन्नाटा पसरा था। दोपहर तक गिद्धों के सारे झुंड शहर की तरफ़ कूँच कर दिए और वहाँ पहुँच कर मनुषयों की लाशों पर जम कर जीमे।

अब गिद्ध कभी भूखे नहीं रहते। उन्हें एक अटूट उपाय जो मिल गया है।

पुनश्चः - उस गिद्ध मंत्री, जिसने वो उपाय सुझाया था, को उसकी सेवाओं के लिए गिद्धों के उच्चतम सम्मान "गिद्ध रत्न" से सम्मानित किया गया।

Tuesday, March 24, 2009

Nano Aayi - Khushiyan Laayi? (नैनो आई - खुशियाँ लाई?)

आखिरकार वो दिन आ ही गया, जिस दिन का हर भारतीय आम आदमी को बरसों से इंतज़ार था। २३ मार्च, २००९ को टाटा ने अपनी नवीनतम, सबसे किफ़ायती और आम जनता की पहुँच वाली कार 'नैनो' का अनावरण कर दिया। अब वो दिन लद गए जब स्कूटर से जाते समय बारिश की वजह से आपका सामान और किताबें इत्यादि भीग कर खराब हो जाया करता था। और लाल बत्ती पर किसी अमीरज़ादे की गाड़ी देख कर आप मन ही मन सोचा करते थे कि काश मेरे पास भी एक कार होती। काश मैं भी अपने परिवार के साथ इस शानदार सवारी का आनंद ले सकता। तो लीजिये जनाब, जो वादा श्री रतन टाटा ने कुछ वर्षों पहले भारत की जनता से किया था कि एक दिन वो भारतीय बाज़ारों में 'लखटकिया' कार लेकर आएँगे वो आज पूरा हो चला है। अब कोई भी साधारण नौकरी पेशा और मध्यमवर्गीय परिवार गर्व से कह सकता है कि वो भी 'कार वाले' हैं।

पर इन सब सपनों के बीच एक हकीकत का आईना है जिसे देख मैं थोड़ा विचलित हूँ। आप कह सकते हैं कि मैं एक निराशावादी की तरह सोच रहा हूँ परंतु इस ओर भी गौर करना आवश्यक है। मुझे अभी टाटा नैनो की विश्वसनीयता पर संदेह है। जैसे कि, क्या ये कार जिसका रंग-रूप और आकार उसके नाम के अनुरूप ही काफ़ी छोटा और नाज़ुक सा दिखता है, भारतीय सड़कों के साथ न्याय कर पाएगा? अर्थात, क्या ये कार भारतीय परिस्थितियों में, जो कि काफ़ी कठिन हैं, उन्हें सह पाएगी? और सड़क पर इसमें बैठे परिवार की सुरक्षा की क्या गारंटी है? इसके अतिरिक्त क्या पर्यावरण पर खतरा और बढ़ नहीं जाएगा? जबकि इतनी कारें सड़कों पर हैं, इनके सस्ते नमूने उपलब्ध होने पर और हर किसी की पहुँच में आने पर क्या पर्यावरण इससे प्रभावित नहीं होगा? जो परिवार अभी तक सार्वजनिक परिवाहन इस्तेमाल करता था, वो भी कार में चलेगा तो इससे सड़कों पर मुसीबतें बढ़ने की पूरी संभावना है।

एक और बात है जो थोड़ी हास्यास्पद है परंतु यहाँ इसकी चर्चा करना अनुचित नहीं होगा। रतन जी ने वादा किया था कि वो 'लखटकिया' कार लाएँगे। पर नैनो के दाम, भले की काफ़ी कम हों, सहायक उपकरणों के साथ एक लाख से काफ़ी ज़्यादा हैं। तकनीकी रूप से सोचें तो 'लखटकिया' कार अभी भी 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' की तरह ही है। परंतु कोई कुछ भी कहे, या कितने ही तथ्यों का डंका पीटे, उस दिन भारतीय सड़कों पर क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार रहें जिस दिन नैनो की पहली खेप ग्राहकों को जारी की जाएगी।

टिप्पणियां आमंत्रित।

Yeh Duniya Agar Mil Bhi Jaye To Kya Hai? (ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?)


This song inspired Anurag Kashyap to make his best masterpiece till date, 'Gulaal'. So, I thought to share it with all. The particulars of the song are:
Movie-Pyaasa(1957)
Music-Sachin Dev Burman
Lyrics-Saahir Ludhiyanavi
Singer-Mohammad Rafi

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया,
ये इन्साँ के दुश्मन समाजों की दुनिया,
ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी,
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी,
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

यहाँ एक खिलौना है इन्साँ की हस्ती,
यहाँ बसती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती,
यहाँ तो जीवन से है मौत सस्ती,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

जवानी भटकती है बदकार बन कर,
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर,
यहाँ प्यार होता है व्यापार बन कर,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है,
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है,
यहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया,
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया,
तुम्हारी है तुम ही सम्भालो ये दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

Monday, March 23, 2009

23rd March, 1931


Today is the 79th martyrdom day (शहीद दिवस) of the three legends of Indian Independence Movement. Sardar Bhagat Singh, Sukhdev Thapar and Shivaram Rajguru were hanged to death by the British Empire on 23rd March, 1931. No surprises if many of us did not remember it, as we are used to the freedom for which they laid their lives without even bothering about their personal interests, family etc. Anyways I thought of writing something in honor of these martyrs but was stuck with this song from 'Gulaal' movie. What is better homage to them, than to dedicate a song which might be in future become an anthem for another revolution in India. The awesome music and lyrics is given by Piyush Mishra.

आरंभ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड,
आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो,
आन बान शान या कि जान का हो दान आज,
एक धनुष के बाण पे उतार दो,
आरंभ है प्रचंड...

मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले,
वही तो एक सर्वशक्तिमान है,
विश्व की पुकार है ये भागवत का सार है कि,
युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है,
कौरवों की भीड़ हो या पाँडवों का नीड़ हो,
जो लड़ सका है वो ही तो महान है,
जीत की हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं,
क्या ज़िन्दगी है ठोकरों पे मार दो,
मौत अंत है नहीं तो मौत से भी क्यों डरें,
ये जा के आसमान में दहाड़ दो,
आरंभ है प्रचंड...

हो दया का भाव या कि शौर्य का चुनाव या कि,
हार का हो घाव तुम ये सोच लो,
या कि पूरे भाल पर जला रहे विजय का लाल,
लाल ये गुलाल तुम ये सोच लो,
रंग केसरी हो या मृदंग केसरी हो,
या कि केसरी हो काल तुम ये सोच लो,
जिस कवि की कल्पना में ज़िन्दगी हो प्रेम गीत,
उस कवि को आज तुम नकार दो,
भीगती मसों में आज फूलती रगों में आज,
आग की लपट का तुम बखार दो,
आरंभ है प्रचंड...

Tuesday, March 3, 2009

Shankhnaad (शंखनाद)

This poem is written keeping in mind the General Elections in India which are going to be held in April-May 2009.

आज फ़िर वो घडी़ है आई,
युद्ध स्थल ने हुँकार लगाई;
चलो साथियों करो तैयारी,
क्योंकि अब है तुम्हारी बारी।

पाँच साल का शासन काला,
दुकानों पर लग गया ताला;
चारों ओर है मची तबाही,
बिना रीढ़ की सरकार थी आई।

टूटी सड़कें बिजली न पानी,
ऐसे ही जीते आए हम जानी;
भ्रष्टाचार से जूझती जनता,
पर करें क्या किसको चिंता?

आतंकवाद ने कहर बरसाया,
मासूमों का खून बहाया;
महंगाई बस में न समाई,
रोटी-दाल को तरसे भाई।

कुशासन का गुज़रा दौर,
आज हुई है नई भोर;
अब वो समय फ़िर है आया,
बाज़ी तुम्हारे हाथ में भाया।

जातिवाद का न हो आधार,
मतदान पर करो विचार;
बुद्धि-विवेक से तोलो तथ्य,
चुनो उसे जो बोले सत्य।

जागो रे !!!!!

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०३-०३-०९ 03-03-09

Friday, February 27, 2009

Rekhayein (रेखाएँ)

मेरे हाथ की रेखाएँ
कुछ धुँधली कुछ उजली,
और उनके बीच छिपी
मेरे जीवन की पहेली ।

कहते हैं कि सबकी,
किस्मत की कुँजी इन
रेखाओं में ही कहीं,
दबी सी है रहती ।

मुद्दतों से सभी इनके
मायाजाल में हैं बंदी,
आज तलक कोई भी ना
सुलझा पाया ये गुत्थी ।

बचपन से यौवन तक
की मेरी ये कहानी,
जिसकी पटकथा है लिखी
इन रेखाओं की जुबानी ।

मेरे हाथ की रेखाएँ
कुछ उजली कुछ धुँधली,
और उनके बीच छिपी
मेरे जीवन की पहेली ।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२७-०२-०९ 27-02-09

Thursday, February 26, 2009

Shoonya (शून्य)

शून्य क्या है?

अनंत ब्रह्मांड की गहराई
में ताकता मैं और उसके,
खालीपन का एहसास कराता
एक अजीब सा सन्नाटा जिसमें,
ना चाहते हुए भी मुझे,
समंदर में गोता लगाने के
समान आभास होता है ।

मैं बेचैन हो इधर-उधर उसकी,
तपिश से बचने की कोशिश
में अपने आप को समेटे,
भागने की तैयारी में लगा,
यही सोचते हुए कि किसी
तरह मैं उस से बच
निकलने में कामयाब हो जाऊँ ।

पर क्या कोई कभी अपने
आप से भी भाग सका है?
मेरे अस्तित्व का भूस्खलन इस
बात का जीता प्रमाण है,
अभी भी वही अनसुलझा हुआ,
आदि से लेकर अंत तक
बस यही एक प्रश्न;

शून्य क्या है?

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२६-०२-०९ 26-02-09

Tuesday, February 24, 2009

The "Kaala Bandar" In Me


Yesterday, I got the privilege to watch Delhi-6. In whole of the movie, I was wondering what exactly this "Kaala Bandar" plot is up to. It is only after the movie ended that I realized that believe it or not, there is a "Kaala Bandar" inside every one of us out here.

It is not that people don't know that a "Kaala Bandar" resides inside them. It is just they don't wan to accept this fact. From my previous experiences with different sections of society, with people of different intellectual levels, different age groups etc, I came to know there was only one thing common among all these, that here people follow a 'Zero Tolerance Policy' against changing themselves. In other words, they have that "Kaala Bandar" inside them, but are not ready to eliminate it. Perhaps they don't have the guts to tackle it, or you can say their will power is so weak that even after recognizing and realizing the stature of "Kaala Bandar" they are not capable of removing it.

Talking about the "Kaala Bandar" inside me, it is practically huge. And it grows further when I treat some fellow citizens with hatred just because we are not of same religion or caste, when I commit something which I ought not to do, when I avoid any of my duties as a student, as a responsible citizen, or a son. I try not to ponder over this but sometimes it is so frustrating that I feel I am a criminal. It seems as if it is eating me up from inside. I feel as if I am hiding something under veils. I feel as if I am not true to myself. It is tough to get rid of it. In fact, it is tough for all of us to get rid of it.

The best we can do from now on in this situation is at least we can prevent its further growth. We can try not to fuel it with our deeds. In this way, the "Kaala Bandar" inside us will be dormant and ineffective. Who knows one day it might be vanished for ever.