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Saturday, November 14, 2009

Pagli Ladki (पगली लड़की)

This poem is one of the earliest and best written by our own renowned Hindi poet Dr. Kumar Vishwas. Enjoy...

अमावस की काली रातों में, दिल का दरवाज़ा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में, गम आँसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में, हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक टिक चलती हैं, सब सोते हैं हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से, सारी यादें चुभ जाती हैं,
जब ऊँच नीच समझाने में, माथे की नस दुख जाती है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।

जब पोथे खाली होते हैं, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नहीं आतीं, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे, दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लश्कर छत से, गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा, मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली, पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ, गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मना करने पर भी, पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना मनचाहा हर काम, कोई लाचारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।

जब कमरे में सन्नाटे की, आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आँखों के नीचे, झांई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो लल्ला दिन भर, कुछ सपनों का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में, कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने लड़की का, एक फ़ोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फ़ोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना, हम को फ़नकारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।

दीदी कहती हैं कि, उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैय्या, तेरे जैसे प्यारे जस्बात नहीं,
वो पगली लड़की मेरे खातिर, नौ दिन भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, पर मुझ से कभी न कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्हीं से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना, कुछ भी अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग, जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।


- डा० कुमार विश्वास

Tuesday, October 13, 2009

Madhushala (मधुशाला)

Madhushala is an epic work of late Shri. Harivansh Rai Bachchan. Consisiting of 135 rubaai (verses of four lines) and 4 were added later, the poet tries to explain the complexity of life in a highly metaphorical way. When first published, it met criticism from many people for its apparent praise of alcohol, but later when the hidden meaning of the verses were understood, it was an instant hit. Below are the few rubaaiaa which are my favorites. Enjoy...


धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।

और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

- हरिवंश राय बच्चन

Sunday, September 6, 2009

Maine Use Kavi Bante Hue Dekha Hai (मैंने उसे कवि बनते हुए देखा है)

I feel delighted to present to you all, the poem which is written by my dear friend Aishwarya Gupta. He wrote this poem keeping in mind my life incidences and described them in a very beautiful way. He gave this poem to me as a present for completing 100 posts on my blog. I could not resist to post this poem here. Thank You very much Aishwarya for such a wonderful present.


एक समय था जब वो भी सबकी तरह,
वक्त की ओखली में पिसा करता था।
बहुत डरा करता था आने वाले समय से,
अपने मन के खिलाफ़ सारे काम किए जा रहा था।

भ्रमित हो रखा था वो अपने जीवन के लक्ष्य से,
नहीं मिल रही थी वो राह जिस पर हमेशा के लिए चलता रहे।
मतलब की चादर ओढ़े दुश्मन रूपी दोस्त दुश्मन बनते चले गए,
अपने विचारों के साथ वो अकेला रह गया।

धीरे-धीरे उसी अकेलेपन में मिल गई उसे वो राह,
वो चाह जिसे ढूँढने वो अकेला हो चला था।
एक सुबह बनी उमंगों की ऐसी ’इमारत’,
टूट गया उसकी कलम का व्रत।

आज चेहरे पर दिखती है संतुष्टि,
मुस्कान में एक गौरव, आने वाले जीवन से बेफिक्र,
वो लिखता चला जा रहा है,
उसकी कलम का असर किसी और पर ना सही उस पर दिखता जा रहा है।

मैंने कीचड़ में उगते हुए कमल को नहीं देखा पर,
मैंने उसे कवि बनते हुए देखा है।


ऐश्वर्य गुप्ता
०६-०९-०९
जेपी विश्वविद्यालय

Friday, September 4, 2009

Shaurya Kya Hai? (शौर्य क्या है?)

These lines are from the film "Shaurya". Javed Akhtar wrote these lines, and they are narrated by Shah Rukh Khan in the film's casting at the end.

शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फ़ौजियों की एक पलटन का शोर,
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शोर।

शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे,
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाइश।

शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास,
या शोलों की बरसात से पल भर में एक शहर को शमशान बना देने का एहसास।

शौर्य,
बहती बियास में किसी के गर्म खून का हौले से सुर्ख हो जाना,
या अनजानी किसी जन्नत की फ़िराक में पल पल का दोज़ख बनते जाना,
बारूदों से धुंधलाए इस आसमान में शौर्य क्या है?

वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य,
शायद एक हौसला शायद एक हिम्मत हमारे बहुत अंदर,
मज़हब के बनाए नारे को तोड़ कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत,
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती दे पाने की हिम्मत,
मरती मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत।

शौर्य,
आने वाले कल की खातिर अपने हिस्से की कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत।

शौर्य क्या है?

Tuesday, September 1, 2009

A Thousand Desires

These lines are narrated in one of the sound tracks of the film "Hazaaron Khwahishen Aisi". I found them amusing. The lyrics and narration is done by Mr. Pritish Nandy, the CEO of Pritish Nandy Communications. It is the same banner who produced the film.




A thousand desires such as these,
A thousand moments to set this night on fire.
Reach out and you can touch them,
You can touch them with your silences,
You can reach them with your lust.
Rivers, mountains, rain.
Rain against the torrid hill's cape,
A thousand,
A thousand desires such as these.

I loved rain as a child,
As a lost young man,
Empty landscapes bleached by a tired sun.
And then,
And then suddenly it came like
A dark unknown woman.
Her eyes scorched my silences,
Her body wrapped itself around me
Like a summer without end.

Pause me,
Hold me,
Reach me where no man has gone.
Crossing the seven seas,
With the wings of fire,
I fly towards nowhere.
And you,
Rivers, mountains, rain.
Rain against the scorched landscape of pain.

A thousand desires such as these,
A thousand moments to set this night on fire.
Reach out and you can touch them,
You can touch them with your silences,
You can reach them with your lust.
Rivers, mountains, rain.
Rain against the torrid hill's cape,
A thousand,
A thousand desires such as these.

Friday, August 28, 2009

Than Gayi! (ठन गई!)



This poem is written by ex-Prime Minister of India and an esteemed poet, Mr. Atal Bihari Vajpayee. During the period of Emergency (1975-77), he was put in to Bangalore Jail, where he fell extremely ill. He was then admitted to AIIMS, New Delhi where he wrote this poem.


ठन गई! मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उम्र क्या है?
दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी है सिलसिला,
आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया,
मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा,
कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव,
चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर,
फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर,
ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई,
रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, त्योरी तन गई।

ठन गई! मौत से ठन गई!


-अटल बिहारी वाजपेयी

Saturday, August 22, 2009

Is Baar Nahi (इस बार नहीं)

This poem was written by Mr. Prasoon Joshi after the Mumbai attacks of 26th November. I found it worth posting on my blog.

इस बार जब वो छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी
खरोंच ले कर आएगी,
मैं उसे फूँ फूँ कर नहीं बहलाऊँगा,
पनपने दूँगा उसकी टीस को,
इस बार नहीं।

इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा,
नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले,
दर्द को रिसने दूँगा, उतरने दूँगा अंदर गहरे,
इस बार नहीं।

इस बार मैं ना मरहम लगाऊँगा,
ना ही उठाऊँगा रुई के फाहे,
और ना ही कहूँगा कि तुम आँखें बंद कर लो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूँ,
देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव,
इस बार नही।

इस बार जब उलझनें देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा,
नहीं दौड़ूगा उलझी डोर लपेटने,
उलझने दूँगा जब तक उलझ सके,
इस बार नहीं।

इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औज़ार,
नहीं करूँगा फ़िर से एक नयी शुरूआत,
नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की,
नहीं आने दूँगा ज़िंदगी को आसानी से पटरी पर,
उतरने दूँगा उसे कीचड़ में, टेढ़े मेढ़े रास्तों पर,
नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून,
हल्का नहीं पड़ने दूँगा उसका रंग,
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार,
कि पान की पीक और खून का फ़र्क की खत्म हो जाए,
इस बार नहीं।

इस बार घावों को देखना गौर से,
थोड़े लंबे वक्त तक,
कुछ फ़ैसले,
और उसके बाद हौसले,
कहीं तो शुरूआत करनी ही होगी,
इस बार यही तय किया है।

-प्रसून जोशी

Sunday, May 24, 2009

Drive (ड्राइव)

This poem is written by one of my friends, Mr. Ghanshyam Das Ahuja, who lives in Navi Mumbai. It is written in context with the traffic police's drive against the vehicles which litter on the streets. It is indeed a realistic and motivating attempt.

ट्रेफ़िक पुलिस का ये ड्राइव यकीनन लाएगा रंग,
मानसून ही क्यों हमेशा यही रहे उमंग,
इसी संदर्भ में मेरा है एक बेशकीमती सुझाव,
दुकानदार जो करते हैं कचरा उन पर भी खाओ ताव।

कईयों को मैंने कचरा फेंकते देखा है,
देखा ही नहीं कई बार उन्हें टोका है,
पर जब तलक पड़ेगा नहीं कानून का डंडा,
साफ़ सुथरी रोड के बजाय माहौल रहेगा गंदा।

पार्क/गार्डन में जो लोग करते हैं कचरा,
उन लोगों से है हमारे समाज को खतरा,
काश हर इंसान सलीके से रह सबकी सोचता,
मैं ये कविता ना लिख कुछ और सोचता।

-घनश्याम दास आहुजा

Friday, November 28, 2008

Koi Deewana Kehta Hai (कोई दीवाना कहता है)

This poem is written by renowned Hindi poet of our time Dr. Kumar Vishwas. I really liked it, so I decided to share with all of you. So, here it is.

कोई दीवाना कहता है,
कोई पागल समझता है ।
मगर धरती की बेचैनी को,
बस "बादल" समझता है ।
मै तुझसे दूर कैसा हू,
तू मुझसे दूर कैसी है ?
ये तेरा दिल समझता है,
ये मेरा दिल समझता है ।

मोहब्बत एक एहसासो की,
पावन सी कहानी है ।
कभी कबीरा दीवाना था,
कभी मीरा दीवानी है ।
यहा सब लोग कहते है,
मेरी आँखों मे आँसू है ।
जो तू समझे तो मोती है,
जो ना समझे तो पानी है ।

समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन,
रो नही सकता ।
ये आँसू प्यार का मोती है,
मै इसको खो नही सकता ।
मेरी चाहत को तू अपना बना लेना,
मगर सुन ले ।
जो मेरा हो नही पाया,
वो तेरा हो नही सकता ।

भ्रमर कोई कुमुदिनी पर,
मचल बैठा तो हन्गामा ।
हमारे दिल मे कोई ख्वाब,
पल बैठा तो हन्गामा ।
अभी तक डूब के सुनते थे,
सब किस्सा मोहब्ब्त का ।
मै किस्से को हकीकत मे,
बदल बैठा तो हन्गामा ।

कोई दीवाना कहता है,
कोई पागल समझता है ।
मगर धरती की बेचैनी को,
बस "बादल" समझता है ।


- डा० कुमार विश्वास