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Thursday, May 27, 2010

Aaj Tumhara Janmdin Hai (आज तुम्हारा जन्मदिन है)

आज वो दिन आया है,
जिसका सभी को इंतज़ार था,
आज का दिन तुम्हारा दिन है,
आज तुम्हारा जन्मदिन है।

खुशियों से भरा ये लम्हा है,
चारों तरफ़ एक रौनक है,
मुबारक हो तुम्हें ये हसीन पल,
आज तुम्हारा जन्मदिन है।

आज तो जश्न की रात है,
तुम्हारे लिए कुछ खास है,
संजो के रखना ये पल,
आज तुम्हारा जन्मदिन है।

आज तो मस्ती में खोना है,
संग तुम्हारे झूमना है,
साल में सिर्फ़ एक बार है आता,
आज तुम्हारा जन्मदिन है।

सोचा तुम्हें क्या दूँ,
ऐसा मेरे पास क्या है,
ये कविता है तुम्हारा तोहफ़ा,
आज तुम्हारा जन्मदिन है।


-प्रत्यूष गर्ग
२२-०३-२०१०

Bojh (बोझ)

उम्मीदों के बोझ तले दबे ये कंधे,
और उन पर टिका ये मस्तक,
जिस पर गहराती लकीरों के पीछे से झांकती मायूसी,
शायद यही बयां करती है कि कुछ ठीक नहीं है।

अनसुलझे प्रश्नों के भंवर में फंसा ये मन,
जिसमें चिंतन की लहरें उठती तो हैं,
परंतु तट तक पहुँचने से पहले ही,
दम तोड़ देती हैं।

गर्म रेत की चादर पर फैली,
पथरीली चट्टानों सी घबराहट को इंतज़ार है,
पश्चिम की उस बयार का जो अपने साथ बादलों का झुंड लाए,
और प्यासी धरती की आग बुझाए।

तरसता हूँ मैं आज उस मासूम मुस्कुराहट के लिए,
जिसकी खनखनाहट सुन कभी मेरा सवेरा होता था,
अब तो जूझता हूँ मैं अपने ही आप से,
कि शाम ढले किसी तरह अपने डेरे तक पहुँच जाऊँ।


-प्रत्यूष गर्ग
१२-०२-२०१०

Monday, November 16, 2009

Baazaar (बाज़ार)

देवियों और सज्जनों,
आइए आइए यहाँ पर बाज़ार लगा है,
जहाँ सब कुछ बिकता है।
चमकीले लिबासों में सजा,
यहाँ सब कुछ मिलता है।

यहाँ हर चीज़ की कीमत है,
बस चुकाने वाला चाहिए।
दिल को बड़ा कर बोली लगाइए,
फिर कीमत चुकाइए,
और घर ले जाइए।

यहाँ इंसान बिकते हैं,
और उनके अरमान भी,
ज़मीर खरीदे बेचे जाते हैं।
कीमत मिलने का वायदा मिले,
तो जज़्बात भी बिक जाते हैं।

ये बाज़ार बड़ा ज़ालिम है बाबू,
जो दिखता है बस वही बिकता है।
यहाँ जंगल का कानून है लागू,
जो गिरा पड़ा है,
वो रौंद दिया जाता है।

इसकी हवा में एक नशा है,
जो यहाँ आता है,
वो धुत हो जाता है।
संयम और समझदारी से ही,
इस से बचा जा सकता है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१६-११-२००९ 16-11-2009

Monday, November 9, 2009

Aaj Vo Dukhi Hai (आज वो दुखी है)

आज वो दुखी है,
उसका दिल टूटा है,
उसका कोई अपना,
आज उस से रूठा है।

आज रिश्तों के कुछ,
मज़बूत बंधन टूटे हैं,
पुराने कुछ धागे उसके,
हाथों से छूटे हैं।

क्या करे वो कहाँ जाए,
किसको अपनी पीड़ा बतलाए,
घर उसके खुशी की दस्तक हुए,
आज एक अरसा बीता है।

नादान था वो,
अभी तक बच्चा था,
सही गलत पहचानने में,
अभी थोड़ा कच्चा था।

वो जिसे अपना समझ,
ताउम्र झुलसता रहा,
वही दगाबाज उसे,
हमेशा ही डसता रहा।

पर अब इंसानी फितरत को,
उसने बखूबी भाँप लिया है,
और संभलने का प्रण कर,
वो दोबारा चल पड़ा है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०९-११-२००९ 09-11-2009

Saturday, October 3, 2009

Mrityu Ki Godd Mein (मृत्यु की गोद में)

एक दिन ऐसा आएगा,
जब ये सब कुछ नहीं रहेगा,
रह जाएगा तो बस एक पिंजर,
और उसमें कैद एक रूह।

रूह भी इस ताक में कि,
कब मौका मिले तो फुर्र हो,
और पिंजर का क्या है,
उसे तो ख़ाक में ही मिलना है।

मुद्दा ये नहीं कि क्या किया,
मुद्दा ये कि क्या करना रह गया,
ईश्वर द्वारा दिए गए सीमित समय में,
कौन काज संवरना रह गया।

हे बंधुजन, ये सुनो!

मृत्यु की गोद में समाने से पहले,
अपने मकसद को पहचानो,
और उस दिशा में आगे बढ़ो,
क्या पता कल हो न हो।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०३-१०-०९ 03-10-2009

Thursday, October 1, 2009

Safar (सफ़र)

My friend's parents are celebrating their 25th marriage anniversary this week and he asked me to write a poem for that occasion. So here it is, my first "On Demand" poem.


वक्त अपनी रफ़्तार से चलता रहा और हम मंज़िल की तलाश में भटकते रहे,
इस बीच एक हमसफ़र मिला तो सोचा साथ चलेंगे तो राहें आसान होंगी।

पता ही न चला कि कब मंज़िल से ज़्यादा राहें प्यारी हो चलीं,
क्योंकि इस बहाने हमसफ़र के साथ चलने का बहाना मिल गया।

ज़िंदगी है ही ना खत्म होने वाला सफ़र,
जिसमें गर कोई साथी मिले तो मज़ा ही कुछ और है।

आज मुड़ कर देखते हैं तो सफ़र के निशां दिखते हैं,
हमारे साथ के गवाह हमारे अपने साथ दिखते हैं।

सैंकड़ों खट्टी मीठी यादों के सहारे हम,
२५ सालों के इस ठहराव पर आ पहुँचे हैं।

अब बस यही दुआ है खुदा से कि इस ठहराव को मंज़िल का नाम न मिले,
और जब तक चल रही हैं साँसें या खुदा ये सफ़र भी यूँ ही चलता रहे।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०१-१०-०९ 01-10-2009

Monday, September 28, 2009

Ravan (रावण)

Today is Dussehra (Vijay Dashmi). So, I thought to celebrate it by writing a poem.

कहते हैं कि आज के दिन,
श्री राम ने रावण का वध किया था।
घोर बुराई का अंत कर,
संसार को पाप मुक्त किया था।
दस सिरों वाले राक्षस की,
नाभि भेद उसका संहार किया था।

तब से लेकर अब तक हर वर्ष,
हम ये प्रथा निभाते हैं।
कागज़ का रावण बना कर,
उसे हम फिर जलाते हैं।
और इसे बुराई पर अच्छाई की जीत
समझ कर हम खुश हो जाते हैं।

पर कब हम अपने भीतर पलते,
सहस्त्र सिरों वाले रावण को मारेंगे।
नाभि भेद उस राक्षस की अपने,
अंतर्मन को पावन करेंगे।
जिस क्षण ऐसा कुछ हम करेंगे,
उस क्षण दशहरे को हम चरितार्थ करेंगे।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२८-०९-०९ 28-09-2009

Friday, September 25, 2009

Ardhangini (अर्धांगिनी)

This poem is dedicated to my mother, Dr. Shashi Gupta.

वो जो हर पुरुष की पूरक है,
करती उसके लिए व्रत है।

वो जो ममता का सागर है,
वही जो प्रेम की गागर है।

वो जो गरिमा की मिसाल है,
वही जो ज्ञान का भंडार है।

वो जो कहती कुछ नहीं,
वही जो सहती सब कुछ है।

वो जिसे खुद कुछ चाह नहीं,
पर उसे सबकी चाहत का ख्याल है।

वही तो परिवार चलाती है,
हर मुसीबत से भिड़ जाती है।

वो जब दबी-कुचली जाती है,
तब वही रण-चंडी बन आती है।

वो जो करोड़ो में एक है,
वही जो सबसे नेक है।

उसकी उपस्थिति मंगलमय है,
वही जो सर्वप्रिय है।

वो जो समाज का आधार है,
वह और कोई नहीं अर्धांगिनी है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२५-०९-०९ 25-09-2009

Wednesday, September 2, 2009

Shrapit Jeevan (श्रापित जीवन)

कन्या भ्रूण हत्या की असंख्य घटनाओं से द्रवित हो लिखी गई है ये कविता।

मैं अभी छोटी थी,
बहुत छोटी, नन्हीं सी।
मैनें कभी सूर्य के उजाले को,
देखा तक नहीं था।
ना ही कभी फूलों की खुशबू,
को महसूस किया था।

अभी बहुत कुछ करना था मुझे,
गुड्डे-गुड़ियों की शादी करनी थी,
घर-घर खेलना था।
जल्दी से बड़ा हो और,
खूब पढ़ाई कर,
डाक्टर बनना था।

पर शायद मेरे माँ-बापू,
भैय्या चाहते थे।
मेरे अंदर होने का जब उन्हें पता लगा,
उनका उल्लास काफ़ूर हो चला था।
और मेरे पैदा होने से पहले ही,
मुझे मार दिया गया।

मैं चीखी, चिल्लाई,
पर शायद किसी को भी,
मेरी सिसकी नहीं दी सुनाई।
आखिर मेरा कसूर क्या था,
जो मुझे खुले आसमान के नीचे,
साँस लेने से महरूम किया गया।

मरते मरते भी माँ-बापू,
मैं चाहती थी आपसे ये पूछना,
भैय्या की ही तरह क्यों नहीं दिया,
मुझे भी एक भय रहित उन्मुक्त वातावरण।
और आखिर क्यों दिया मुझे,
ऐसा अधूरा और श्रापित जीवन।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०२-०९-०९ 02-09-09

Sunday, August 30, 2009

Premarth (प्रेमार्थ)

This poem is loosely based on "The Seven Stages Of Love" which I described earlier.

प्रेम का अर्थ जाने बिन,
कहते हैं लोग कि उन्हें भी,
बहना है प्रेम की धारा में,
रहना है प्रेम की छाया में।

आकर्षण की जिस आंधी को,
लोग प्रेम का नाम हैं देते,
वो न जाने असल प्रेम की,
छवि को धूमिल ही वो करते।

मोह की मदिरा में डूब,
क्या जानेंगे वो लोग,
कि आखिर किस एहसास में,
प्रेम छिपा है किस विश्वास में।

प्रेम तो है जैसे पवन,
जो निरंतर बहती है,
प्रेम तो है जैसे नदी,
जो कलकल करती चलती है।

प्रेम तो है जैसे पूजा,
जो कभी न खाली जाती है,
प्रेम तो है वो जुनूनी ताकत,
जो सदा ही हावी रहती है।

प्रेम तो है वो आशा,
जो मृत्यु के बाद भी जीवित है,
प्रेम की है यही परिभाषा,
जो ना समझे वो मूर्ख है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
३०-०८-०९ 30-08-09

Wednesday, August 19, 2009

Dhoomketu (धूमकेतु)

This poem is dedicated to my good friend Sudhir Kumar, without whom it was never going to be complete.


पल में चमक पल में अंधकार,
क्षण में जीत क्षण में हार,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

अपने ही पथ पर घूमता,
जैसे हर घड़ी कुछ ढूँढता,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

अग्नि सा जलता तन,
अलाव की राख़ से आँसू,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

कुछ रास्ते छोड़ता कुछ रिश्ते जोड़ता,
तब भी अपने में सुलगता,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

परम सत्य की तलाश में,
झूठ से घायल आकाश में,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

देखा है मैंने धर्म को जलते हुए,
आस्था की आँच पर ईश्वर-अल्लाह को ढलते हुए,
अब ना जाने कितना जलेगा,
ये मेरा धूमकेतु सा जीवन ।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१९-०८-०९ 19-08-09

Punarjanm (पुनर्जन्म)

This poem is inspired by the book "Many Lives Many Masters" written by Dr. Brian Weiss. Also, this poem is dedicated to my dear friend Divyanshu Tripathi, who made me read that awesome book.


किसी विद्वान से सुना था मैंने कभी,
हर जीवित तन में है आत्मा का वास,
तन नष्ट हो जाते हैं फ़िर भी,
पहुँचे न आत्मा को क्षति कुछ खास ।

समय बदले तन बदले,
आज यहाँ कल वहाँ विराजे,
अलग योनि अलग रूप में,
हर बार संसार को साजे ।

परंतु कर्मों की छाया से,
हो उज्जवलित और धूमिल,
और सारे निर्णयों का फल,
हो अगले जीवन में शामिल ।

विरले होते हैं वो जिनको,
याद रहे ये अगला पिछला,
अपनी आप बीती सुनाने का,
मिले मौका ये निराला ।

कठिन है बहुत स्वीकारना,
इस जीवन-दर्शन को,
पर जिस क्षण हो एहसास,
संजोना उस पल को ।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१९-०८-०९ 19-08-09

Tuesday, August 18, 2009

Khushi (खुशी)

आज मेरे मन-मस्तिष्क में,
ये विचार कौंधा कि,
आखिर जिसे कहते हैं खुशी,
वो एहसास क्या है?

क्या वो क्षणिक आनंद,
जो हमें कभी मिला था;
उसे खुशी की श्रेणी में,
रखा जा सकता है?

या वो क्षणभंगुर नशा,
जो किसी जीत के बाद
चढ़ा था; वो खुशी की
गरिमा बढ़ा सकता है?

बहुत चिंतन के बाद,
निष्कर्ष ये निकला कि,
जो निश्चल और निरंकार है,
उसी में खुशी का सार है।

जिसका कोई अंत नहीं,
जिसे अमरता का वरदान है,
जिसे कोई बांध नहीं सकता,
वही खुशी का एहसास है।


-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१८-०८-०९ 18-08-09

Wednesday, May 13, 2009

Hum (हम)

मैं और तुम,
हम दोनों,
दुनिया की नज़र में,
दो अलग जिस्म,
दो अलग जान हम।

तुम शायद ना जानो,
शायद ना मानो,
कि हम बने हैं साथ
रहने के लिए,
साथ जीने के लिए।

मेरी आँखें खुली हैं सदा,
इसी इंतज़ार में कि कब,
तुम्हें इल्म हो कि अब,
हम एक हो यही सही है,
वक्त की ज़रूरत है।

कोई गम नहीं मुझे,
अगर वक्त मेरा साथ ना दे,
मोहब्बत में शर्त कैसी?
ये तो है एक पाक एहसास,
जो है ना किसी का मोहताज़।

मुझे फ़िक्र नहीं दुनिया की,
यहाँ सब मतलब के साथी,
अगर हम साथ तो,
हर मुश्किल हर परेशानी,
फूलों की सेज सरीखी।

तुम बस एक बार एक नज़र भर,
कह दो कि मैं और तुम अब हैं हम,
तुम्हारी कसम,
उस पल से पुराने सब किस्से खत्म,
और नए आयाम छूने उड़ चले हम।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
१३-०५-०९ 13-05-09

Tuesday, May 5, 2009

Jeevan-Darshan (जीवन-दर्शन)

लोग पूछें रे ये बतलावो,
जीवन-दर्शन ये क्या बला है?
आखिर किसने इधर-उधर कब,
कौन नया रूप ढला है?

सबरे पूछें हैरत के मारे,
ऐसा कैसा ये खेल भयो?
कौन खिलाड़ी इसका है,
और कौन खिलाने वाला है?

मैं बोलयो रे मूरख प्राणी,
ये क्या पूछ लिया तूने?
इसका उत्तर देवे ऐसा,
कोई क्या कभी बना है?

संत महात्मा साधू राजे,
सबरे हारे इसके आगे,
हम तुम तुच्छ प्राणी,
भला कहाँ ठहरेंगे सारे?

आज ये समझो बस तुम इतना,
खेल खिलावे ऊपर वाला,
नियम कायदे सारे उसके,
खेलन वाले हम सब सारे।

इस खेल का एक नियम है,
जो खेले सो हर दम हारे,
गर कभी कोई जीत जावे,
"उसका" अवतार होगा वो प्यारे।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०५-०५-२००९ 05-05-2009

Saturday, April 11, 2009

Aakhiri Faisala (आखिरी फ़ैसला)

ये कहानी प्रेरित है एक सच्ची घटना से जो कुछ साल पहले कोलकाता में घटी थी। मुझे इसका पता अखबारों से लगा था और तब मैंने इस बारे में विचार किया कि ऐसा हुआ तो आखिर क्यों? कहानी के किरदार असल ज़िंदगी से लिए गए हैं और उनके साथ जो कुछ हुआ वो भी असलियत है, बस उसको प्रस्तुत करने के काम में मुझे अपनी कल्पना के मोती भी जोड़ने पड़े हैं।

हमारी कहानी के मुख्य पात्र एक सेवानिवृत सरकारी कर्मचारी हैं, जो कि अपने कार्यकाल में अपनी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके साफ़ सुथरे व्यक्तित्व का सब आदर करते थे। उनकी पत्नी एक सीधी साधी और पूजा पाठ करने वाली साधारण महिला थी। वे ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं परंतु अपने श्रीमान के साथ हर सुख दुख में डट कर साथ खड़ी रहीं और अपने पति के हर फ़ैसले का सम्मान किया। वैसे उन दोनों को किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थी, परंतु अगर कुछ नहीं था उनके पास तो कोई ऐसा जिसे अपनी औलाद कह सकें। बहुत सालों पहले उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी पर वो बेचारा कुछ महीनों में ही भगवान को प्यारा हो गया। आज अगर होता तो कोई २४-२५ वर्ष का होता। उसके जाने के बाद श्रीमति जी ने हर संभव प्रयास किया कि उन्हें ये सौभाग्य प्राप्त हो पर कोई खास परिणाम नहीं निकला। बहरहाल, दोनों ने अब तक किसी तरह एक दूसरे के सहारे जीवन यापन किया। पर कहीं न कहीं एक कसक दिल में बाकी रह ही गई, कि जीवन भर जो इतनी मेहनत की, वो किस काम की, जब कोई वारिस ही नहीं, कोई ऐसा ही नहीं जिसे अपना कह सकें, जिसे प्रेम से गले लगा सकें। कोई ऐसा है ही नहीं, जो राम जी के पास पहुँचने पर उनकी चिता को अग्नि भी दे सके।

सेवानिवृत जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि ना चाहते हुए भी मन उन बातों की तरफ़ भटकता है जिनके बारे में सोचने से पीड़ा होती है। और स्थिति की विडंबना ये है कि जब हम कामकाज में व्यस्त होते हैं तो सोचते हैं कि कब इस सब से छुट्टी मिले तो कुछ आराम किया जाए। बस इसी विकट समस्या ने हमारे मुख्य पात्र को घेर रखा था। श्रीमति जी तो फ़िर भी ईश्वर के चरणों में समर्पित थीं तो उनका समय कट जाया करता था, परंतु श्रीमान क्या करें? कोई पुराना शौक भी नही जिससे दिल बहला लें। बस अब रह रह के यही ख्याल आता कि अब जियें तो किसके लिए। ऐसे ही एक अलसाई सुबह श्रीमान जी उठे, तो थोड़े विचलित थे। श्रीमति जी का ध्यान उस ओर गया पर उन्होंने उनसे इस बारे में कुछ भी नहीं पूछा। तीस साल साथ रहने के बाद आपको अपने साथी के स्वभाव का बखूबी अंदाज़ा लग जाता है। वो जानती थीं कि आज कल श्रीमान की मनोस्थिति कैसी चल रही है, इसीलिए उन्होंने उनको उनके हाल पर छो़ड़ना ही उचित समझा। परंतु शाम होते होते बात अपने आप ही साफ़ हो गई। श्रीमान जी उनके पास आए और बताया, "आज सुबह से ही मेरा मन बड़ा विचलित है। मुझे एक अजीब सी जकड़न महसूस हो रही है जो मुझे चैन नहीं लेने दे रही। भीतर कुछ ऐसा है जो मुझे मन ही मन कचोट रहा है। असल बात यह है कि अब मेरी जीने की इच्छा समाप्त हो गई है।" पूरी बात सुन श्रीमति जी परेशान हो उठीं। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो श्रीमान जी को कैसे समझायें। खैर उन्होंने अपने पति से कहा, " देखिये, बीती बातों को भूल जाइए और अपने बाकी के जीवन को, जो है उसी में गुज़ारने की कोशिश कीजिए।" बात आयी गयी हो गई।

इस बीच श्रीमान जी का मन अब पूरी तरह उखड़ चुका था। उनके मन में तरह तरह के विचार पनपने लगे। उनके दांपत्य जीवन पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ा और वो अपनी पत्नी को, जिनसे उन्होंने इससे पहले कभी ऊँची आवाज़ में बात तक नहीं की थी, बात बात पर झिड़क देते। शायद उन्हें ये गलतफ़हमी हो गई थी कि कहीं न कहीं उनकी इस अवस्था का कारण उनकी पत्नी भी हैं। अब उन्हें ये कौन समझाये कि होनी को जो मंज़ूर था वही हुआ, इसमें बेचारी श्रीमति जी का क्या दोष? पर इतना सब होने के बाद भी बेचारी ने उफ़ तक नहीं की। शायद उन्होंने इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया था। दिन गुज़रते गए और हालात बद से बदतर होते रहे।

एक शाम श्रीमान जी अपनी पत्नी से बोले, "देखो भाग्यवान, आज हावड़ा ब्रिज घूमने चलते हैं। सैर की सैर हो जाएगी और मन भी बहल जाएगा।" श्रीमति जी अचानक आए इस परिवर्तन से बहुत प्रसन्न हुयीं। उन्हें लगा कि शायद अब श्रीमान जी पहले की तरह ही सामान्य हो रहे हैं और उन्होंने अपने कष्टों से समझौता कर लिया है। वे तुरंत राज़ी हो गयीं और जल्दी से तैयार हो कर चल पड़ीं। परंतु उन्हें अपने पति के इरादों का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था। इस घूमने ले जाने के पीछे एक बड़ा राज़ छिपा था। हावड़ा ब्रिज पहुँचने पर श्रीमान जी ने अपने इरादे ज़ाहिर किए। वे बोले, " मैं आज यहाँ अपना जीवन समाप्त करने आया हूँ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब मेरे जीने का कोई औचित्य नहीं बनता। मैं जिन भी कामों के लिए इस दुनिया में आया था वो पूरे हो चुके हैं और अब मैं ये संसार त्यागना चाहता हूँ। मैं ये भी चाहता हूँ कि जैसे तुमने अब तक किए गए मेरे सारे फ़ैसलों में मेरा साथ दिया है, इस आखिरी फ़ैसले में भी मेरा साथ दो। मैं तुमसे अभी भी उतना ही प्रेम करता हूँ जितना कि पहले करता था। मैंने पिछले कुछ समय में नासमझी में कुछ गलत कहा हो या किया हो तो मुझे माफ़ कर दो।" ये सब सुन कर श्रीमति जी सकते में आ गयीं। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि श्रीमान जी ऐसा कदम उठाने की भी सोच सकते हैं। उन्होंने रोते हुए कहा, "प्रिय, आप ऐसी बातें न कीजिये। मेरा आपके सिवा और कोई नहीं है। क्या आपने ये भी नहीं सोचा कि आपके बाद मेरा क्या होगा? मैं आपके बिना एक पल नहीं रह सकती। मैं आपको ये कदम उठाते नहीं देख सकती।" इस पर श्रीमान जी बोले, " मेरे पास और कोई रास्ता नहीं हैं। मैं अब एक पल नही रह सकता। मुझे मेरे फ़ैसले पर अमल कर लेने दो और तुम घर वापस लौट जाओ।" फ़िर कुछ सोचने के बाद श्रीमति जी ने कहा, " ठीक है। अगर आप अपनी बात पर अडिग हैं तो मैं भी अचल हूँ। पूरा जीवन आपके साथ बिताने का वचन दिया था तो आपके साथ मरने को भी तैयार हूँ। वैसे भी आपके अलावा मेरा ना कोई ओर है ना छोर। मैं भी आपके साथ अपना जीवन समाप्त करना चाहती हूँ"। अब रोने की बारी श्रीमान जी की थी। उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि श्रीमति जी ऐसा कुछ करने को तैयार हो जाएँगी। उन्होंने बहुत समझाया पर वो नहीं मानी। आखिरकार दोनों ने ही पुल से छलांग लगा दी।

कहानी यहीं खत्म हो जाती तो मुझे थोड़ा कम दुख होता। पर आगे की बात जान कर कलेजा मुँह को आ गया। नदी में कूदने पर श्रीमान जी का सामना जब सचमुच की मौत से हुआ तो उनको पता चला कि अपनी जान देना इतना आसान काम नहीं है। कहाँ तो वो इतने दिनों से प्राण त्यागने की बात सोच रहे थे और कहाँ अब उनके मन में किसी तरह से बचने का ख्याल आ गया। वे तैरना जानते थे, इसीलिये किसी तरह से किनारे तक आ गए। परंतु श्रीमति जी के शरीर को अगले दिन गोताखोरों की मदद से ही निकाला जा सका। नदी किनारे अपना सिर पकड़े श्रीमान जी बैठे हैं और सोच रहे हैं कि उन्होंने ये आखिरी फ़ैसला आखिर क्यों लिया? पहले वो तन्हा थे, अब... पहले से भी ज़्यादा...

Tuesday, March 31, 2009

Subah (सुबह)

मेरे प्रिय मित्र मुदित सिंह को समर्पित। भगवान उसे सदबुद्धि दे।

अलसाई सी सुबह में अंगड़ाई लेता कोई,
और उसकी अधखुली आँखों में,
नए दिन के लिए देखे सपनों की झलकी,
याद दिलाती उसे कि आज फ़िर उसकी,
मंज़िल काफ़ी दूर अपना डेरा है डाले बैठी।

मंज़िल की चाह में फ़ुर्ती से उठ बैठा वो,
शीघ्रता से मन को किया कड़ा,
और सुबह की हसीन नींद के आनंद को त्यागा,
उस निश्चल निर्विघ्न नदी की भांति,
जो सागर से मिलने से पहले दम भी नहीं भरती।

आज उसकी वो मेहनत रंग लाई और वो,
कामयाबी की ऊँचाइयों को छूता हल्के से मुस्कुराता,
बीते दिनों की यादों में खोता यही सोचता,
कि कहीं उस रोज़ वो आलस कर बैठता,
तो आज ये हसीन मंज़र उसे ताउम्र नसीब न होता।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
३१-०३-२००९ 31-03-2009

Thursday, March 26, 2009

Giddh (गिद्ध)


The recent incidences which occurred in our campus' hostels inspired me to write this story.

एक समय की बात है, एक शहर के गिद्धों में भुखमरी फैली थी। गिद्धों का राजा हैरान, परेशान। ऐसी स्थिति उसकी समझ से परे थी। उसकी प्रजा में हाहाकार मचा था और वो बेबस हो इधर उधर टहल रहा था। तभी उसे अपने मंत्रियों की याद आई। उसने एक आपातकाल बैठक बुलाने की सोची। आनन-फ़ानन में सभी मंत्रियों को संदेश भेज कर बुलवाया गया। राजा ने सभी मंत्रियों के सामने स्थिति की गंभीरता का जायज़ा लिया और सभी से इस बारे में उपाय करने की अपील की। अंत में एक मंत्री ने इस विकट परिस्थिति से निपटने का उपाय सुझाया। पूरा उपाय सुनने के बाद सभी उपस्थित गिद्धों ने सहमति जताई और बैठक खुशी खुशी संपन्न हुई।

अगले दिन मुँह अंधेरे कुछ गिद्धों ने शहर की तरफ़ प्रस्थान किया और वहाँ बीचों-बीच स्थित मनुष्यों के एक समुदाय के प्राथना स्थल को अपने पंजों और चोंचो से क्षतिग्रस्त कर दिया। दूसरी ओर कुछ और गिद्धों ने एक दूसरे समुदाय के प्राथना स्थल के साथ भी ऐसा ही किया। काम निपटाने के बाद सभी गिद्ध अपने ठिकानों पर जाकर बैठ गए और सुबह होने का इंतज़ार करने लगे।

सुबह हुई तो शहर में तबाही का मंज़र था। दोनों समुदाय के मनुष्य आपस में ऐसे मार-काट कर रहे थे जैसे उन्हें बरसों से इस दिन का इंतज़ार हो। चारों ओर अफ़रातफ़री का माहौल था। कुछ ही देर में पूरे शहर की गलियाँ मनुष्यों के लहू से लाल थीं। हर तरफ़ एक भयभीत कर देने वाला सन्नाटा पसरा था। दोपहर तक गिद्धों के सारे झुंड शहर की तरफ़ कूँच कर दिए और वहाँ पहुँच कर मनुषयों की लाशों पर जम कर जीमे।

अब गिद्ध कभी भूखे नहीं रहते। उन्हें एक अटूट उपाय जो मिल गया है।

पुनश्चः - उस गिद्ध मंत्री, जिसने वो उपाय सुझाया था, को उसकी सेवाओं के लिए गिद्धों के उच्चतम सम्मान "गिद्ध रत्न" से सम्मानित किया गया।

Tuesday, March 3, 2009

Shankhnaad (शंखनाद)

This poem is written keeping in mind the General Elections in India which are going to be held in April-May 2009.

आज फ़िर वो घडी़ है आई,
युद्ध स्थल ने हुँकार लगाई;
चलो साथियों करो तैयारी,
क्योंकि अब है तुम्हारी बारी।

पाँच साल का शासन काला,
दुकानों पर लग गया ताला;
चारों ओर है मची तबाही,
बिना रीढ़ की सरकार थी आई।

टूटी सड़कें बिजली न पानी,
ऐसे ही जीते आए हम जानी;
भ्रष्टाचार से जूझती जनता,
पर करें क्या किसको चिंता?

आतंकवाद ने कहर बरसाया,
मासूमों का खून बहाया;
महंगाई बस में न समाई,
रोटी-दाल को तरसे भाई।

कुशासन का गुज़रा दौर,
आज हुई है नई भोर;
अब वो समय फ़िर है आया,
बाज़ी तुम्हारे हाथ में भाया।

जातिवाद का न हो आधार,
मतदान पर करो विचार;
बुद्धि-विवेक से तोलो तथ्य,
चुनो उसे जो बोले सत्य।

जागो रे !!!!!

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
०३-०३-०९ 03-03-09

Friday, February 27, 2009

Rekhayein (रेखाएँ)

मेरे हाथ की रेखाएँ
कुछ धुँधली कुछ उजली,
और उनके बीच छिपी
मेरे जीवन की पहेली ।

कहते हैं कि सबकी,
किस्मत की कुँजी इन
रेखाओं में ही कहीं,
दबी सी है रहती ।

मुद्दतों से सभी इनके
मायाजाल में हैं बंदी,
आज तलक कोई भी ना
सुलझा पाया ये गुत्थी ।

बचपन से यौवन तक
की मेरी ये कहानी,
जिसकी पटकथा है लिखी
इन रेखाओं की जुबानी ।

मेरे हाथ की रेखाएँ
कुछ उजली कुछ धुँधली,
और उनके बीच छिपी
मेरे जीवन की पहेली ।

-प्रत्यूष गर्ग Pratyush Garg
२७-०२-०९ 27-02-09