This beautiful ghazal was sung by renowned Pakistani ghazal singer Fareeda Khanum. This is one of her master-piece and was duplicated several times all over the world. Asha Bhonsle also sung it for a music album. Most recently, the original version of this ghazal was used in the movie Monsoon Wedding by Meera Nair. Here are the lyrics (which was originally given by Fayyaz Hashmi) for this evergreen and legendary ghazal which has stolen my heart for quite some time now.
आज जाने की ज़िद ना करो,
यूँ ही पहलू में बैठे रहो,
आज जाने की ज़िद ना करो,
हाय मर जाएंगे,
हम तो लुट जाएंगे,
ऐसी बातें किया ना करो,
आज जाने की ज़िद ना करो।
तुम ही सोचो ज़रा,
क्यों ना रोके तुम्हें,
जान जाती है जब,
उठ के जाते हो तुम,
तुम को अपनी कसम जाने-जां,
बात इतनी मेरी मान लो,
आज जाने की ज़िद ना करो।
वक्त की कैद में,
ज़िंदगी है मगर,
चंद घड़ियाँ यही हैं,
जो आज़ाद हैं,
इन को खो कर मेरी जाने-जां,
उम्र भर ना तरसते रहो,
आज जाने की ज़िद ना करो।
कितना मासूम,
रंगीन है ये समां,
हुस्न और इश्क की,
आज में राज है,
कल की किसको खबर जाने-जां,
रोक लो आज की रात को,
आज जाने की ज़िद ना करो।
आज जाने की ज़िद ना करो,
यूँ ही पहलू में बैठे रहो,
आज जाने की ज़िद ना करो,
हाय मर जाएंगे,
हम तो लुट जाएंगे,
ऐसी बातें किया ना करो,
आज जाने की ज़िद ना करो।
Showing posts with label Ghazal. Show all posts
Showing posts with label Ghazal. Show all posts
Sunday, May 17, 2009
Wednesday, April 8, 2009
Hothon Se Choo Lo Tum (होठों से छू लो तुम)
Jagjit Singh belongs to an elite class of singers whose work cannot be reviewed, rated or compared to anybody else's work. He is a maestro and has his own league. But if I somehow weight his entire work and was to pick one ghazal of all times, I will choose ’होठों से छू लो तुम’. It is my personal favorite. This ghazal was originally sung for the movie 'Prem Geet' released in 1981. The song was pictured on Raj Babbar, as he sings it in a party. After that, it became so popular that no live concert of Jagjit Singh is completed without the request for this one. Here is the lyrics which was originally given by Indeevar (1924-1999). Enjoy and be mesmerized by the magic of the words.
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन।
ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन।
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन।
नई रीत चला कर तुम, ये रीत अमर कर दो।
नई रीत चला कर तुम, ये रीत अमर कर दो।
आकाश का सूनापन, मेरे तन्हा मन में।
आकाश का सूनापन, मेरे तन्हा मन में।
पायल छनकाती तुम, आ जाओ जीवन में।
साँसें देकर अपनी, संगीत अमर कर दो।
संगीत अमर कर दो, मेरा गीत अमर कर दो।
जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा।
जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा।
सब जीता किए मुझसे, मैं हर दम ही हारा।
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो।
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन।
ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन।
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन।
नई रीत चला कर तुम, ये रीत अमर कर दो।
नई रीत चला कर तुम, ये रीत अमर कर दो।
आकाश का सूनापन, मेरे तन्हा मन में।
आकाश का सूनापन, मेरे तन्हा मन में।
पायल छनकाती तुम, आ जाओ जीवन में।
साँसें देकर अपनी, संगीत अमर कर दो।
संगीत अमर कर दो, मेरा गीत अमर कर दो।
जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा।
जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा।
सब जीता किए मुझसे, मैं हर दम ही हारा।
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो।
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो।
होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो।
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो।
Labels:
Ghazal,
Hothon Se Choo Lo Tum,
Indeevar,
Jagjit Singh
Sunday, August 3, 2008
Hazaaron Khwahishen Aisi (हज़ारो ख्वाहिशे ऐसी)
हज़ारो ख्वाहिशे ऐसी, कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फ़िर भी कम निकले ।
क्यो मेरा कातिल, क्या रहेगा उसकी गर्दन पर,
वो खून, जो चश्म-ए-तार से उम्र भर यू दम-ब-दम निकले ।
निकलना खुल्द से आदम का, सुनते आये है लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।
भ्रम खुल जाये ज़ालिम, तेरी कामत की दराज़ी का,
अगर इस तराहे पर पेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले ।
मगर लिखवाये कोई उसको खत, तो हमसे लिखवाये,
हुई सुबह और घर से, कान पर रख कर कलम निकले ।
हुई इस दौर मे मन्सूब मुझसे बडा आशामी,
फिर आया वो ज़माना, जो जहा मे जाम-ए-जाम निकले ।
हुई जिन से तवक्का खास्तगी की दाद पाने की,
वो हम से भी ज़्यादा खास्ता-ए-तेघ-ए-सितम निकले ।
मोहब्ब्त मे नही है फ़र्क, जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते है, जिस काफ़िर पे दम निकले ।
ज़रा कर जोर सीने पर कि तीर-ए-परसितम निकले,
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले ।
खुदा के वास्ते, पर्दा ना काबिज़ उठा ज़ालिम,
कही ऐसा ना हो, यहा भी, वही काफ़िर सनम निकले ।
कहा मयखाने का दरवाज़ा गालिब, और कहा वाइज़,
पर इतना जानते है कल, वो जाता था कि हम निकले ।
हज़ारो ख्वाहिशे ऐसी, कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फ़िर भी कम निकले ।
Labels:
Ghazal,
Hazaaron Khwahishen Aisi,
Mirza Ghalib,
Urdu
Subscribe to:
Posts (Atom)